पाठ – 4

कार्यपालिका

कार्यपालिका क्या है?

  • गिलक्राइस्ट के अनुसार -”कार्यपालिका सरकार का वह अंग है जो कानून के रूप में अभिव्यक्त जनता की इच्छा को कार्य में परिणत करती है। यह वह धुरी भी है जिसके चारों ओर राज्य का वास्तविक प्रशासन घूमता है।”
  • मेक्रिडीस के अनुसार – “राजनीतिक कार्यपालिका, राजनीतिक समाज के शासन के लिए औपचारिक उत्तरदायित्व निभाने वाली संस्थागत व्यवस्थाएं हैं।”
  • कार्यपालिका का अर्थ व्यक्तियों के उस समूह से है जो नीतियों, नियमों और कायदे-कानूनों को संगठन में लागू करते हैं।
  • सरकार का वह अंग जो विधायक द्वारा स्वीकृत नीतियों और कानूनों को लागू करने के लिए उत्तरदायी होता है वह कार्यपालिका कहलाता है।
  • संसद द्वारा पारित नियमों या कानूनों का निष्पादन करनेवाला विभाग ही कार्यपालिका कहलाता है।

कार्यपालिका के कार्य :-

  • सरकार की नीतियों को लागु करना एवं विधायी निकायों द्वारा बनाये गए कानूनों को अमल में लाना।
  • कार्यपालिका कानून निर्माण प्रक्रिया में सरकार की सहायता करता है।
  • कार्यपालिका राज्यों के साथ संबंधों का संचालन करता है।
  • विभिन प्रकार के संधियों एवं समझौतों का निष्पादन करता है।
  • सभी देशों में राज्य का अध्यक्ष देश की सशस्त्र सेना का सर्वोच्य कमांडर होता है परंतु वह किसी युध्य में भाग नहीं लेता है।

कार्यपालिका के प्रकार :-

1) सामूहिक नेतृत्व के सिद्धांत पर आधारित प्रणाली:-

  • संसदीय प्रणाली
  • अर्थ – अध्याक्षात्मक प्रणाली

2) एक व्यक्ति के नेतृत्व के सिद्धांत पर आधारित प्रणाली:-

  • अध्याक्षात्मक प्रणाली

संसदीय शासन प्रणाली

  • संसदीय प्रणाली लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की वह प्रणाली है जिसमें कार्यपालिका अपनी लोकतांत्रिक वैधता विधायिका के माध्यम से प्राप्त करती है और विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है।
  • इस प्रकार संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका और विधायिका एक-दूसरे से परस्पर संबंधित होते हैं। इस प्रणाली में राज्य का मुखिया (राष्ट्रपति) तथा सरकार का मुखिया (प्रधानमंत्री) अलग-अलग व्यक्ति होते हैं।
  • भारत की संसदीय व्यवस्था में राष्ट्रपति नाममात्र की कार्यपालिका है तथा प्रधानमंत्री तथा उसका मंत्रिमंडल वास्तविक कार्यपालिका है।
  • संसदीय प्रणाली में प्रधानमंत्री देश की शासन व्यवस्था का सर्वोच्च प्रधान होता है, हालाँकि संविधान के अनुसार राष्ट्र का सर्वोच्च प्रधान राष्ट्रपति होता है लेकिन देश की शासन व्यवस्था की बागडोर प्रधानमंत्री के हाथों में ही होती है।

अध्याक्षात्मक शासन प्रणाली

  • लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में प्रायः राज्य का प्रमुख (राष्ट्राध्यक्ष) सरकार (कार्यपालिका) का भी अध्यक्ष होता है।
  • अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में कार्यपालिका अपनी लोकतांत्रिक वैधता के लिये विधायिका पर निर्भर नहीं रहती है। इस प्रणाली में राष्ट्रपति वास्तविक कार्यपालिका प्रमुख होता है।
  • अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में कार्यपालिका और विधायिका एक-दूसरे से संबंधित नहीं होते हैं। इस प्रणाली में राज्य का मुखिया तथा सरकार का मुखिया एक ही व्यक्ति होते हैं।

अर्ध – अध्याक्षात्मक शासन प्रणाली :-

  • अर्ध – अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों होते हैं परंतु संसदीय शासन प्रणाली के विपरीत उसमें राष्ट्रपति को दैनिक कार्य के संपादन में महत्वपूर्ण शक्तियां प्राप्त हो सकती है।
  • इस व्यवस्था में, कभी-कभी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों ही एक दल के हो सकते हैं; परंतु जब कभी वह दोनों भिन्न-भिन्न दलों के होते हैं तो उनमें आपस में विरोध हो सकता है जो स्वाभाविक है।
  • फ्रांस, रूस और श्रीलंका जैसे देशों में अर्ध – अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था है।

भारत का राष्ट्रपति :-

1. राष्ट्रपति की संवैधानिक स्थिति :-

  • राष्ट्रपति भारत का प्रथम नागरिक एवं देश का संविधान प्रधान होता है। भारतीय संघ की कार्यपालिका की शक्ति राष्ट्रपति में निहित है। जिसका प्रयोग वह स्वयं अथवा अपने अधीन अधिकारियों के माध्यम से करता है।
  • राष्ट्रपति की संविधान की स्थिति की बात करें तो अनुच्छेद 52 में राष्ट्रपति पद का प्रावधान किया गया है। राष्ट्रपति का पद सर्वाधिक सम्मान, गरिमा तथा प्रतिष्ठा वाला पद है। राष्ट्रपति राष्ट्र का अध्यक्ष होता है।
  • भारत में संसदीय व्यवस्था को अपनाया गया है क्योंकि मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति उत्तरदाई हैं अतः राष्ट्रपति नाम मात्र की कार्यपालिका है तथा प्रधानमंत्री एवं उसका मंत्रिमंडल वास्तविक कार्यपालिका है।

2. भारत का राष्ट्रपति बनने के लिए योग्यताएं :-

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 58 के अनुसार कोई व्यक्ति राष्ट्रपति होने योग्य तब होगा, जब वह –
    • भारत का नागरिक हो
    • 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो
    • लोकसभा का सदस्य निर्वाचित किए जाने योग्य हो।
    • चुनाव के समय लाभ का पद पर न हो, लेकिन राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति राज्यपाल संघ व राज्य के मंत्री लाभ के पद पर नहीं माने जाते हैं अतः उन्हें राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनाया जा सकता है।

3. भारतीय राष्ट्रपति की निर्वाचन प्रक्रिया :-

भारतीय राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए निर्वाचक मंडल का उल्लेख भारतीय के अनुच्छेद अनुच्छेद 54 में है।

  • राष्ट्रपति उम्मीदवार के निर्वाचन मंडल में 50 सदस्य प्रस्तावक के रूप में तथा 50 सदस्य अनुमोदक रूप में होना आवश्यक है।
  • भारत के राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल द्वारा होता है इसमें लोक सभा राज्य सभा तथा राज्यों के विधान सभाओं को केवल निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं।
  • अनुच्छेद 55 के अनुसार राष्ट्रपति का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से एकल संक्रमणीय मत पद्धति द्वारा समानुपातिक प्रणाली के आधार पर होता है।
  • राष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित विवादों का निपटारा उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाता है।

4. भारत के राष्ट्रपति के विशेषाधिकार :-

  • राष्ट्रपति की क्षमादान शक्तियां :-

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को किसी अपराधी को सजा को क्षमा करने, उसका प्रविलंवन करने, परिहार और सजा लघुकरन करने का अधिकार प्राप्त है। राष्ट्रपति को मृत्युदंड माफ करने का भी अधिकार प्राप्त है।

  • राष्ट्रपति की सैन्य शक्तियां :-

    • भारत के राष्ट्रपति के पास सैन्य बलों की सर्वोच्च कमांडर होता है।
    • राष्ट्रपति को युद्ध और शांति की घोषणा करने तथा सैन्य बलों को विस्तार करने हेतु आदेश देने की शक्ति प्राप्त है।
  • राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियां :-

    • अनुच्छेद 352 :-
      • अनुच्छेद 352 के अंतर्गत युद्ध बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह की स्थिति में राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि पूरे भारत या किसी एक भाग की सुरक्षा खतरे में है तो वह संपूर्ण भारत या किसी भाग में आपातकाल घोषणा कर सकता है।
      • अगर यह अवधि 1 माह के पश्चात संसद से अनुमोदित ना हो तो ऐसी स्थिति में स्वत: समाप्त हो जाती है।
      • इस तरह की घोषणा को संसद के दो तिहाई बहुमत से पास होना आवश्यक होता है।
    • अनुच्छेद 356 :-
      • अनुच्छेद 356 के अंतर्गत यदि कोई राज्य सरकार संवैधानिक नियमों के अनुरूप कार्य नहीं कर रही है तो राष्ट्रपति तत्काल की घोषणा वहां ऐसी घोषणा को राष्ट्रपति शासन कहा जाता है जिसे संसद द्वारा 2 माह के भीतर अनुमोदन करना आवश्यक होता है।
    • अनुच्छेद 360 :-
      • अनुच्छेद 360 के अंतर्गत देश में आर्थिक संकट की स्थिति में राष्ट्रपति अपनी विशिष्ट शक्तियों का प्रयोग कर वित्तीय आपात की घोषणा कर सकता है।

5. राष्ट्रपति की वीटो शक्तियां :-

राष्ट्रपति को तीन प्रकार की वीटो शक्तियां प्राप्त है :-

  • पूर्ण वीटो :-
    • इस वीटो शक्ति के तहत राष्ट्रपति किसी विधेयक पर अपनी अनुमति नहीं देता है, अर्थात वह अपनी अनुमति को सुरक्षित रख सकता है।
  • निलंबन वीटो :-
    • इस वीटो शक्ति के अंतर्गत राष्ट्रपति किसी विधेयक को संसद के पास पुनर्विचार हेतु भेज सकता है।
  • जेबी वीटो / पॉकेट वीटो :-
    • इस वीटो शक्ति के तहत राष्ट्रपति किसी विधेयक को अनिश्चितकाल के लिए अपने पास सुरक्षित रख सकता है अर्थात इस वीटो शक्ति का प्रयोग राष्ट्रपति द्वारा किसी विधेयक पर न अनुमति देता है, न ही अनुमति देने से इनकार करता है और न ही पुनर्विचार हेतु संसद के पास भेजता है।

नोट :- विवादास्पद भारतीय डाक संशोधन विधेयक 1986 के संबंध में तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह द्वारा जेबी वीटो का प्रयोग किया गया भारत में किसी राष्ट्रपति द्वारा जेबी वीटो का यह प्रथम बार प्रयोग किया गया था।

भारत का उपराष्ट्रपति :-

1. निर्वाचन प्रक्रिया :-

  • अनुच्छेद 66 (1) में उपराष्ट्रपति के निर्वाचन प्रक्रिया का वर्णन है इसके अनुसार उपराष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल द्वारा होता है जिसमें संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्य शामिल होते हैं अतः मनोनीत सदस्य भी उपराष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेते हैं |
  • राष्ट्रपति के सामान उपराष्ट्रपति का निर्वाचन भी अप्रत्यक्ष तथा अनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के तहत एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है क्योंकि इसमें प्रांतों के विधान मंडलों में भाग लेने का प्रावधान नहीं है |
  • अनुच्छेद 66 (1) के अनुसार उप राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में सिर्फ राज्यसभा एवं लोकसभा के सदस्य भाग लेते हैं |

2️. उपराष्ट्रपति पद के लिए योग्यताएं :-

  • अनुच्छेद 66 (3) के अंतर्गत उपराष्ट्रपति का चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति के लिए योग्यताएं निर्धारित की गई है जो निम्नवत है :-
    • वह भारत का नागरिक हो,
    • वह 35 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो,
    • वह राज्यसभा का सदस्य बनने की योग्यता रखता हो,
    • वह केंद्र सरकार अथवा राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकरण या अन्य किसी सार्वजनिक प्राधिकरण के अंतर्गत किसी लाभ के पद पर न हो,
    • वर्तमान राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति और किसी राज्य का राज्यपाल तथा संघ या राज्य का मंत्री किसी लाभ के पद पर नहीं माने जाते हैं अतः इसी कारण व उपराष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए योग्य होती हैं इसके साथ-साथ उपराष्ट्रपति के चुनाव के नामांकन के लिए उम्मीदवार के पास कम से कम 20 प्रस्तावक और अनुमोदक होनी चाहिए |

3️. पदावधि एवं पद रिक्तियों की स्थिति :-

  • अनुच्छेद 377 के अनुसार उप राष्ट्रपति अपने पद ग्रहण की तारीख के 5 वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा परंतु उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग कर सकता है |
  • (अनुच्छेद 68) उपराष्ट्रपति राज्यसभा द्वारा किए गए संकल्प द्वारा पद से हटाया जा सकेगा जिसे राज्यसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत ने पारित किया हो और जिससे लोकसभा सहमत है परंतु हटाने के संकल्प प्रस्तावित करने के 14 दिन पूर्व उपराष्ट्रपति को सूचित करना होगा |
  • उप राष्ट्रपति अपने पद की अवधि समाप्त हो जाने पर भी तब तक पद धारण करता रहेगा जब तक कि उसका उत्तराधिकारी अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है |
  • जब उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है तब उसे महाभियोग लगाकर उसी विधि से हटाया जा सकेगा जिस विधि से संविधान में राष्ट्रपति को हटाए जाने की व्यवस्था है |

4️. उपराष्ट्रपति के कार्य एवं शक्तियां :-

क) राज्यसभा अध्यक्ष के रूप में :-

  • अनुछेद 64 के अनुसार उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है और अन्य कोई लाभ का पद धारण नहीं करेगा परंतु जब राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है तब राज्यसभा के सभापति के रूप में कार्य नहीं करेगा |
  • उपराष्ट्रपति राज्यसभा के अध्यक्ष के रूप में इसके अधिवेशनों की अध्यक्षता करता है राज्यसभा में अनुशासन रखना उसकी जिम्मेदारी है |

ख) राष्ट्रपति के रूप में :-

  • अनुच्छेद 65 उपराष्ट्रपति को राष्ट्रपति का कार्य सौपता है अनुच्छेद 65(1) राष्ट्रपति की मृत्यु, पदत्याग या पद से हटाए जाने या अन्य कारण से उसके पद में हुई रिक्त की दशा में उपराष्ट्रपति उस तारीख तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा |
  • जब तक नवनिर्वाचित राष्ट्रपति अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है उपराष्ट्रपति अधिक से अधिक 6 माह तक राष्ट्रपति के पद पर कार्य कर सकता है क्योंकि संविधान के अनुसार नहीं राष्ट्रपति का चुनाव छह माह के अंदर हो जाना चाहिए |
  • अनुच्छेद 65 (3) के अनुसार जब उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा तो वह राष्ट्रपति की सभी शक्तियों का प्रयोग करेगा उसे वेतन एवं भत्ते भी राष्ट्रपति वाले मिलेंगे |
  • इसी प्रकार उपराष्ट्रपति जब राज्यसभा के सभापति के रूप में कार्य करता है तो उसे राज्यसभा के सभापति के रूप में वेतन व अन्य सुविधाएं प्राप्त होती है न कि उप राष्ट्रपति के रूप में |

भारत का प्रधानमंत्री

1️. प्रधानमंत्री की नियुक्ति :-

  • विधान के अनुसार राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की नियुक्ति करेगा |
  • अनुच्छेद 75 जो लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल का नेता चुना गया हो परंपरा अनुसार त्रिशंकु लोकसभा की स्थिति में राष्ट्रपति सबसे बड़ा दल या गठबंधन के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है |
  • जैसे 1998 में 12वीं लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेई को प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाना |

2️. प्रधानमंत्री की योग्यताएँ :-

  • वह भारत का नागरिक हो
  • भारत की मतदाता सूची में नाम सम्मिलित हो
  • प्रधानमंत्री लोक सभा या राज्य सभा दोनों में किसी एक का सदस्य हो | सदस्य न होने की स्थिति में उसे छ: महीने के अंदर दोनों सदनों में से किसी एक की सदस्यता लेनी अनिवार्य है, अन्यथा उसे अपने पद से त्याग पत्र देना होगा
  • प्रधानमंत्री के लिए व्यक्ति की आयु 25 वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए

3️. प्रधानमंत्री का कार्यकाल अथवा अवधि :-

  • प्रधानमंत्री का कार्यकाल 5 वर्ष होता है परंतु उसका कार्यकाल लोकसभा के बहुमत के समर्थन पर निर्भर है |
  • लोकसभा में बहुमत खो देने तथा अविश्वास प्रस्ताव पास हो जाने पर प्रधानमंत्री को त्यागपत्र देना पड़ता है |
  • प्रधानमंत्री का त्यागपत्र संपूर्ण मंत्रिमंडल का त्यागपत्र समझा जाता है |
  • चौधरी चरण सिंह इंद्र कुमार गुजराल अटल बिहारी वाजपेई को अविश्वास प्रस्ताव के कारण त्यागपत्र देना पड़ा था |

4️.प्रधानमंत्री के कार्य एवं शक्तियां :-

क) मंत्री परिषद के संबंध में :-

केंद्रीय मंत्रिपरिषद प्रमुख के रूप में प्रधानमंत्री के कार्य एवं शक्तियां निम्नलिखित है :-

  • जैसे मंत्रियों के बीच विभाग आवंटन व फेर बदल करना |
  • किसी व्यक्ति को मंत्री नियुक्त करने की सिफारिश राष्ट्रपति को करना या किसी मंत्री को त्यागपत्र देने अथवा राष्ट्रपति द्वारा बर्खास्त करने की सिफारिश करना
  • मंत्रिपरिषद की बैठकों की अध्यक्षता तथा उनके निर्णय को प्रभावित करना स्वयं के त्याग पत्र द्वारा मंत्रिमंडल को बर्खास्त कर देना |

ख) संसद के संबंध में :-

प्रधानमंत्री लोकसभा का नेता होता है अतः इस संबंध में वह निम्न शक्तियों का प्रयोग करता है :-

  • संसद सत्र को आहूत करने एवं सत्रावसान करने संबंधी सलाह राष्ट्रपति को देना |
  • राष्ट्रपति से किसी भी समय लोक सभा विघटित करने की सिफारिश करना |
  • संसद में सरकार की नीतियों की घोषणा करना आदि |

ग) अन्य शक्तियां व कार्य :-

प्रधानमंत्री की उपरोक्त भूमिका के साथ-साथ अन्य भूमिकाएं भी है जैसे :-

  • राष्ट्र की विदेश नीति को मूर्त रुप देने में प्रभावी भूमिका |
  • केंद्र सरकार का प्रमुख प्रवक्ता |
  • सेनाओं का राजनैतिक प्रमुख |
  • राष्ट्रीय विकास परिषद, राष्ट्रीय एकता परिषद, अंतर राज्य परिषद और राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद का अध्यक्ष होता है |

मंत्री परिषद के कार्य एवं शक्तियां

राज्य में समस्त शासन का संचालन मंत्री परिषद ही करती है| मंत्री परिषद के कार्य एवं शक्तियां निम्न है :-

  • मंत्री परिषद ही राज्य की वास्तविक कार्यपालिका शक्तियों का प्रयोग करती है| प्रत्येक मंत्री अपने विभाग का प्रमुख होता है| मंत्री परिषद प्रशासन चलाने के लिए विधानसभा के प्रति उत्तरदाई है |
  • मंत्री परिषद राज्य के प्रशासन संचालन के लिए नीति का निर्माण करती है| राज्य की राजनीतिक आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं का हल निकालती है |
  • राज्यपाल शासन के उच्च पदों पर नियुक्ति मंत्रिपरिषद की सिफारिश पर ही करता है |
  • मंत्री परिषद की कानून निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका है मंत्री न केवल कानून निर्माण के लिए विधेयक तैयार करते हैं अपितु विधानमंडल में प्रस्तुत भी करते हैं और उनको पारित करवाने में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है |
  • मंत्रीपरिषद बजट तैयार करती है और वित्तमंत्री उसे विधानमंडल में प्रस्तुत करता है |
  • मंत्री परिषद विधानमंडल में शासन का प्रतिनिधित्व करती है और विधानसभा के विभिन्न प्रश्नों यथा-तारांकित, अतारांकित, अल्पसूचना प्रश्न का उत्तर देती है।
  • मंत्रीपरिषद ही विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदाई होती है| गठबंधन सरकार के युग में मंत्रिपरिषद के सामूहिक उत्तरदायित्व में कमी आई है| मंत्री, मुख्यमंत्री के स्थान पर अपने दल के नेता के निर्देश मानते हैं| वे मंत्रिपरिषद के निर्णय की स्वयं आलोचना भी करने लगे हैं जिससे सामूहिक उत्तरदायित्व ह्यस हो रहा है |

स्थायी कार्यपालिका (नौकरशाही)

  • कार्यपालिका में मुख्यतः राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री मंत्रिगण और नौकरशाही या प्रशासनिक मशीनरी का एक विशाल संगठन , सम्मिलित होता है। इसे नागरिक सेवा भी कहते है।
  • नौकरशाही में सरकार के स्थाई कर्मचारी के रूप में कार्य करने वाले प्रशिक्षित और प्रवीण अधिकारी नीतियों को बनाने में तथा उन्हें लागू करने में मंत्रियों का सहयोग करते हैं।
  • भारत में एक दक्ष प्रशासनिक मशीनरी मौजूद है लेकिन यह मशीनरी राजनीतिक रूप से उत्तरदायी है इसका अर्थ है कि नौकरशाही राजनीतिक रूप से तटस्थ है। प्रजातंत्र में सरकारे आती जाती रहती है ऐसी स्थिति में , प्रशासनिक मशीनरी की यह जिम्मेदारी है कि वह नई सरकारों को अपनी नीतियां बनाने में और उन्हें लागू करने में मदद करें।

नौकरशाही के सदस्यों का चुनाव :-

  • नौकरशाही में अखिल भारतीय सेवाएं प्रांतीय सेवाएं , स्थानीय सरकार के कर्मचारी और लोक उपक्रमों के तकनीकी एवं प्रबंधकीय अधिकारी सम्मिलित है। भारत में सिविल सेवा के सदस्यों की भर्ती की प्रक्रिया का कार्य संघ लोक सेवा आयोग (यू. पी. एस. सी.) को सौंपा गया है।

लोक सेवा आयोग :-

  • ऐसा ही लोकसेवा आयोग राज्यों में भी बनाए गए है जिन्हें राज्य लोक सेवा आयोग कहा जाता है।
  • लोक सेवा आयोग के सदस्यों का कार्यकाल निश्चित होता हैं उनको सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के द्वारा की गई जांच के आधार पर ही निलंबित या अपदस्थ किया जा सकता है।
  • लोक सेवकों की नियुक्ति दक्षता व योग्यता को आधार बनाकर की जाती हैं संविधान ने पिछड़े वर्गों के साथ साथ समाज के सभी वर्गों को सरकारी नौकरशाही बनने का मौका दिया है इसके लिए संविधान दलित और आदिवासियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था करता है।

अखिल भारतीय सेवाओं का वर्गीकरण

  • आखिल भारतीय सेवाएं – भारतीय प्रशासनिक सेवा भारतीय पुलिस सेवा।
  • केन्द्रीय सेवाएं भारतीय विदेश सेवा भारतीय सीमा शुल्क|
  • प्रांतीय सेवाएं डिप्टी कलेक्टर बिक्री कर अधिकारी।
    • भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS आई. ए. एस.) तथा भारतीय पुलिस सेवा (IPSआई. पी. एस.) के उम्मीदवारों का चयन संघ लोक सेवा आयोग करता है । किसी जिले का जिलाधिकारी (कलेक्टर) उस जिले में सरकार का सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी होता है और ये समान्यतः आई. ए. एस. स्तर का अधिकारी होता है।

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