पाठ 12 ध्वनि

ध्वनि का संचरण

  • ध्वनि (Sound): जब किसी वस्तु में कंपन्न उत्पन्न होने से ध्वनि उत्पन्न होती है|
  • ध्वनि उत्पन्न करने वाले एक यन्त्र का नाम: कंपमान स्वरित्र द्विभुज है|
  • कंपन (Vibration): किसी वस्तु का तेजी से इधर-उधर गति करना कंपन कहलाता है|

ध्वनि उत्पन्न करने के तरीके:

  • किसी वस्तु पर आघात कर
  • घर्षण द्वारा
  • खुरच कर
  • रगड़ कर,
  • वायु फूँक कर या उनको हिलाकर ध्वनि उत्पन्न कर सकते है।

मनुष्य में ध्वनि: मनुष्यों में ध्वनि उनके वाक तंतुओं के कंपित होने के कारण उत्पन्न होता है|

  • ध्वनि तरंग के रूप में गति करती है|
  • मधुमक्खियों के पंखों के कंपन से ध्वनि निकलती है जिसे भिनभिनाहट कहते हैं|

ध्वनि का संचरण (Propagation of Sound):

ध्वनि का एक स्थान से दुसरे स्थान तक स्थानांतरण होता है इसे ही ध्वनि का संचरण कहते  है|

माध्यम (Medium): द्रव्य या पदार्थ जिससे होकर ध्वनि संचरित होती है, माध्यम कहलाता है|

ध्वनि के संचरण के लिए माध्यम:

ध्वनि तीन माध्यमों से होकर संचरित होती है|

(1) ठोस (2) द्रव (3) गैस

जिस माध्यम का घनत्व अधिक होता है उसमे ध्वनि अधिक तेजी से गति करती है अर्थात उस माध्यम में ध्वनि की चाल सबसे अधिक होती है|

अत: सभी माध्यमों कि अपेक्षा  ठोस में ध्वनि कि चाल सबसे अधिक होती है|

ध्वनि संचरित कैसे होती है?

ध्वनि स्रोत से ध्वनि कम्पन से उत्पन्न होता है और यह अपने आस-पास के कणों में विक्षोभ पैदा करता है| चूँकि तरंग एक विक्षोभ है जो किसी माध्यम से होकर गति करता है और माध्यम के कण निकटवर्ती कणों में गति उत्पन्न कर देते हैं। ये कण इसी प्रकार की गति अन्य कणों में उत्पन्न करते हैं। माध्यम के कण स्वयं आगे नहीं बढ़ते, लेकिन विक्षोभ आगे बढ़ जाता है। यह प्रक्रिया तब तक चलता रहता है जब तक विक्षोभ हमारे कानों तक पहूँच नहीं जाता।

संपीडन (compression):

जब कोई कंपमान वस्तु आगे की ओर कंपन करती है तो इस प्रकार एक उच्च दाब का क्षेत्र उत्पन्न होता है। इस क्षेत्र को संपीडन (C) कहते हैं।

विरलन (rarefaction):

जब कोई कंपमान वस्तु पीछे की ओर कंपन करती है तो इस प्रकार एक निम्न दाब का क्षेत्र उत्पन्न होता है। जिसे विरलन (R) कहते हैं।

संपीडन और विरलन में अंतर:

संपीडन:

  • यह तब बनता है जब कोई वस्तु आगे की ओर गति करता है|
  • यह एक उच्च दाब का क्षेत्र होता है|

विरलन:

  • यह तब बनता है जब कोई वस्तु पीछे की ओर गति करता है|
  • यह एक निम्न दाब का क्षेत्र होता है|

ध्वनि का संचरण घनत्व परिवर्तन के संचरण के रूप में:

किसी माध्यम में कणों का अधिक घनत्व अधिक दाब को और कम घनत्व कम दाब को दर्शाता है। इस प्रकार ध्वनि का संचरण घनत्व परिवर्तन के संचरण के रूप में भी देखा जा सकता है।

ध्वनि तरंग

ध्वनि तरंग (Sound Wave): ध्वनि को तरंग के रूप में जाना जाता है और तरंग एक विक्षोभ है जो कंपमान वस्तु द्वारा उत्पन्न होता है। यह तरंगे अनुदैर्य तरंगे होती हैं। यह संपीडन और विरलन से बनती है।

ध्वनि तरंगे यांत्रिक तरंगे होती है: ध्वनि तरंगों को  संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है यही कारण है कि ध्वनि तरंगों को यांत्रिक तरंगे कहते है|

ध्वनि के संचरण के लिए सबसे सामान्य माध्यम: वायु सबसे समान्य माध्यम है|

निर्वात में ध्वनि का संचरण: निर्वात में ध्वनि संचरित नहीं होती क्योंकि ध्वनि को संचरित होने के लिए किसी न किसी माध्यम की आवश्यकता होती है|

ध्वनि तरंगे अनुदैर्ध्य तरंगें होती हैं:

ध्वनि तरंगें अनुदैर्ध्य तरंगें होती हैं क्योंकि  इन तरंगों में माध्यम के कणों का विस्थापन विक्षोभ के संचरण की दिशा के समांतर होता है। कण एक स्थान से दूसरे स्थान तक गति नहीं करते लेकिन अपनी विराम अवस्था से आगे-पीछे दोलन करते हैं। ठीक इसी प्रकार ध्वनि तरंगें संचरित होती हैं, अतएव ध्वनि तरंगें अनुदैर्घ्य तरंगें हैं।

ध्वनि तरंग के अभिलक्षण:

किसी ध्वनि तरंग के निम्नलिखित अभिलक्षण होते हैं:

  • आवृति (frequency)
  • आयाम (Amplitude)
  • वेग (velocity)

तरंगदैर्ध्य (Wavelength): किन्हीं दो निकटतम श्रृगों अथवा गर्तों के बीच की दूरी को या एक दोलन पूरा करने में तरंग द्वारा चली गई दूरी को तरंगदैर्ध्य कहते है।

इसे ग्रीक अक्षर (λ) लेम्डा से दर्शाते हैं|

ध्वनि की  चाल =  तरंगदैर्ध्य × आवृति

आवृति (frequency): एक सेकेण्ड में दोलनों की संख्या को आवृति कहते हैं|

आवृति का S.I मात्रक हर्ट्ज़ (Hz) होता है|

आवर्त काल (Time Period): एक दोलन पूरा करने में लगा समय आवर्त काल कहलाता है।

आयाम (Amplitude): किसी तरंग के संचरण में माध्यम के कणों का संतुलन की स्थिति में अधिकतम विस्थापन आयाम कहलाता है।

घनत्व तथा दाब के उतार-चढ़ाव को ग्राफीय रूप में प्रदर्शन:

श्रृंग: ध्वनि तरंग के शिखर को तरंग का श्रृंग कहा जाता है|

गर्त: ध्वनि तरंग के घाटी को गर्त कहा जाता है|

गुणता (Timbre): यह ध्वनि की एक अभिलक्षण है जो हमें समान तारत्व तथा प्रबलता की दो ध्वनियों में अंतर करने में सहायता करता है|

टोन (tone): एकल आवृति की ध्वनि को टोन कहते हैं|

स्वर (note): अनेक आवृतियों के मिश्रण से उत्पन्न ध्वनि को स्वर कहते हैं|

ध्वनि की तीव्रता: किसी एकांक क्षेत्रफल से एक सेकेंड में गुजरने वाली ध्वनि ऊर्जा को ध्वनि की तीव्रता कहते हैं|

ध्वनि की प्रबलता: किसी एकांक क्षेत्रफल इसे एक सेकेंड में गुजरने वाली ध्वनि ऊर्जा को ध्वनि की प्रबलता कहते है।

कारक जिन पर ध्वनि की प्रबलता निर्भर करता है:

प्रबलता ध्वनि के लिए कानों की संवेदनशीलता की माप है। ध्वनि की प्रबलता कंपन्न के आयाम पर निर्भर करते है।

अनुप्रस्थ तरंगों और अनुदैर्ध्य तरंगों में अंतर:

अनुप्रस्थ तरंग (Transverse Waves):

  • इन तरंगों से माध्यम के कण गति की दिशा के लंबवत् गति करते है।
  • इन तरंगों के शिर्ष एवं गर्त बनते है।
  • उदाहरण: प्रकाश तरंग

अनुदैर्ध्य तरंग (Longitudinal Waves):

  • इन तरंगों से माध्यम के कण गति की दिशा के अनुदिश गति करते है।
  • इन तरंगों में संपीडन व विरलन बनते है।
  • उदाहरण: ध्वनि तरंग

तरंग गति (Wave Motion): तरंग गति माध्यम से प्रगमन करता हुआ कंपन विक्षोभ है जिसमें दो बिन्दुओं के बीच सीधे संपर्क हुए बिना एक दुसरे बिन्दु को ऊर्जा स्थानांतरित  की जाती हैं।

ध्वनि का परावर्तन

ध्वनि की चाल को प्रभावित करने वाले कारक:

(i) तापमान: ताप के साथ ध्वनि के वेग में परिवर्तन हो जाता है|

(ii) माध्यम: अलग-अलग माध्यमों में ध्वनि की चाल अलग-अलग होती है|

ध्वनि कि चाल और प्रकाश कि चाल: ध्वनि कि चाल प्रकाश की चाल से कम होता है| उदाहरण के लिए तडित बिजली की चमक तथा गर्जन साथ साथ उत्पन्न होते है। लेकिन चमक दिखाई देने के कुछ सेकेंण्ड पश्चात् गर्जन सुनाई देती है क्योंकि प्रकाश की चाल, ध्वनि की चाल से तीव्र होती है। चूकिं प्रकाश (चमक) हम तक जल्दी पहुँच जाता है और गर्जन (ध्वनि) हम तक निम्न चाल के कारण देर से सुनाई देती हैं।

ध्वनि का परावर्तन (Reflection of Sound): ध्वनि का परावर्तन प्रकाश के परावर्तन जैसा ही होता है और ये परावर्तन के उन सभी नियमों का पालन करती है|

(i) परावर्तक सतह पर खींचे गए अभिलंब तथा ध्वनि के आपतन होने की दिशा तथा परावर्तन होने की दिशा के बीच बने कोण आपस में बराबर होते हैं|

(ii) ध्वनि के आपतन होने की दिशा, अभिलंब और परावर्तन होने की दिशा तीनों एक ही तल में होते हैं|

प्रतिध्वनि (Ecosound): जब कोई ध्वनि किसी माध्यम से टकराकर परावर्तित होती है तो वह ध्वनि हमें पुनः सुनाई देती हैं जिसे प्रतिध्वनि कहते है।

  • ध्वनि तरंगों के परावर्तन के लिए बड़े आकार के अवरोधक की आवश्यकता होती है जो चाहे पालिश किए हुए हों या खुरदरे।
  • हमारे मस्तिष्क में ध्वनि की संवेदना लगभग 0.1 s तक बनी रहती है|
  • स्पष्ट प्रतिध्वनि सुनने के लिए मूल ध्वनि तथा परावर्तित ध्वनि के बीच कम से कम 0.1 s का समय अंतराल अवश्य होना चाहिए।
  • स्पष्ट प्रतिध्वनि सुनने के लिए अवरोध्क की ध्वनि स्रोत से न्यूनतम दूरी ध्वनि द्वारा तय की गई कुल दूरी की आधी अर्थात् 17.2 m अवश्य होनी चाहिए।

ध्वनि के परावर्तन का व्यावहारिक उपयोग

  • ध्वनि के परावर्तन का उपयोग से मेगाफोन या लाऊडस्पीकर, हॉर्न, तुर्य तथा शहनाई जैसे वाध्य यन्त्र बनाए जाते हैं|
  • स्टेथोस्कोप एक चिकित्सीय यन्त्र है जो शरीर के अंदर मुख्यतः हृदय तथा फेफड़ों ने उत्पन्न होने वाली भिन्न-भिन्न ध्वनियों को सुनने और उसकी पहचान करने के लिए किया जाता है|

स्टेथोस्कोप की कार्यविधि:

स्टेथोस्कोप में रोगी के हृदय की धड़कन की ध्वनि, बार-बार परावर्तन के कारण डॉक्टर के कानों तक पहुँचती है|

  • कंसर्ट हॉल, सम्मलेन कक्ष और सिनेमा हॉल में भी ध्वनि का परावर्तन होता है| इन सभी की छतें वक्राकार बनाई जाती है जिससे कि परावर्तन के पश्चात् ध्वनि हॉल के सभी भागों में पहुँच जाये| ध्वनि स्रोत से ध्वनि वक्राकार छत से परावर्तित होकर सामान रूप से पुरे हॉल में फ़ैल जाता है जो सामान रूप से स्रोताओं तक पहुँचता है| यही कारण है कि कंसर्ट हॉल की छतें वक्राकार बनाई जाती है|

अनुरणन (Reverberation):

ध्वनि का दीवारों से बारंबार परावर्तन जिसके कारण ध्वनि-निर्बंध होता है, अनुरणन कहलाता है|

अनुरणन के कारण ध्वनि साफ नहीं सुनाई देती है सुनने में बाधा उत्पन्न होता है| अनुरणन अवांछनीय है इसे कम करने की आवश्यकता होती है|

अनुरणन कम करने के तरीके:

  • इसे कम करने के लिए भवनों में पर्दे लटकाये जाते हैं, ताकि ध्वनि का अवशोषण हो सके|
  • कमरे या सभागारों में श्रोताओं की उपस्थिति बढ़ाने से, इससे भी ध्वनि का अवशोषण होता है|
  • इसे कम करने के लिए संपीडित फाइबर  बोर्ड, खुरदरे प्लास्टर आदि लगाया जाता है|
  • सीटों के पदार्थ सही चुनाव भी ध्वनि अवशोषक के रूप में कार्य करते हैं|

ध्वनि श्रव्यता का परास/परिसर/सीमा (Range of Hearing Sound):

हम सभी प्रकार की ध्वनियों को नहीं सुन सकते हैं|

ध्वनि तीन प्रकार की होती है|

(1) अवश्रव्य ध्वनि (Infrasound): 20 Hz से कम आवृति की ध्वनियों को अवश्रव्य ध्वनि कहते हैं|

अवश्रव्य ध्वनि को सुनने वाले जन्तु:

  • राइनोसिरस (गैंडा) 5 Hz तक की आवृत्ति की अवश्रव्य ध्वनि का उपयोग करके संपर्क स्थापित करता है। व्हेल तथा हाथी अवश्रव्य ध्वनि परिसर की ध्वनियाँ उत्पन्न करते हैं।
  • कुछ जन्तु जैसे चूहे, साँप जो धरती में रहते है भूकंप के समय परेशान हो जाते हैं| ऐसा इसलिए होता है कि जब भूकंप की मुख्य प्रघाती तरंगे आने से पहले एक निम्न आवृति की अवश्रव्य ध्वनि उत्पन्न होता है| जो जंतुओं को सावधान कर देते हैं|

(2) श्रव्य ध्वनि (audible sound): वह ध्वनि जिसकों मनुष्य अपने कानों से सहज सुन सकता है उसे श्रव्य ध्वनि कहते हैं| इसका परिसर 20 Hz से 20 kHz या 20000 Hz होता है| मनुष्य इस सीमा से कम की ध्वनि को सुन नहीं सकता है और इस सीमा से अधिक ध्वनि अर्थात 20 kHz या 20000 Hz की आवृति की ध्वनि को सहन नहीं कर सकता है|

(3) पराध्वनि (Ultrasound): 20 kHz या 20000 Hz से अधिक आवृति की ध्वनि को पराध्वनि (ultrasound) कहते है|

ध्वनि बूम (Sonic Boom):

जब ध्वनि उत्पादक स्रोत ध्वनि की चाल से अधिक तेजी से गति करती हैं। तो ये वायु में प्रघाती तरंगे उत्पन्न करती हैं इस प्रघाती तरंगों में बहुत अधिक ऊर्जा होती है। इस प्रकार की प्रघाती तरंगों से संबद्ध वायुदाब में परिवर्तन से एक बहुत तेज और प्रबल ध्वनि उत्पन्न होती है जिसे ध्वनि बुम कहते है।

पराध्वनि उत्पन्न करने वाले कुछ जन्तु:

  • डॉल्फिन, चमगादड़ और पॉरपॉइज पराध्वनि उत्पन्न करते हैं।
  • कुछ प्रजाति के शलभों (moths) के श्रवण यंत्रा अत्यंत सुग्राही होते हैं। ये शलभ चमगादड़ों द्वारा उत्पन्न उच्च आवृत्ति की चींचीं की ध्वनि को सुन सकते हैं। उन्हें अपने आस-पास उड़ते हुए चमगादड़ के बारे में जानकारी मिल जाती है और इस प्रकार स्वयं को पकड़े जाने से बचा पाते हैं।
  • चूहे भी पराध्वनि उत्पन्न करके कुछ खेल खेलते हैं।

पराध्वनि के अनुप्रयोग (Aplication of Ultrasound):

  • पराध्वनि प्रायः उन भागों को साफ करने में की जाती है जहाँ तक पहुँचना कठिन है। जैसे – सर्पिलाकार नली, इलेक्ट्रानिक पुर्जे इत्यादि।
  • पराध्वनि का उपयोग धातु के ब्लाकों में दरारों का पता लगाने के लिए किया जाता हैं।
  • चिकित्सा क्षेत्र में पराध्वनि (अल्ट्रासाऊण्ड) का प्रयोग बिमारियो का पता लगाने के लिए किया जाता है।
  • पराध्वनि के उपयोग से सोनार नामक युक्ति से जहाजों में समुद्र की गहराई मापने के लिए किया जाता है|

1. सर्पिलाकार नालियों की सफाई में पराध्वनि का उपयोग:

जिन वस्तुओं को साफ करना होता है उन्हें साफ करने वाले मार्जन विलयन में रखते हैं और इस विलयन में पराध्वनि तरंगें भेजी जाती हैं। उच्च आवृत्ति के कारण, धुल, चिकनाई तथा गंदगी के कण अलग होकर नीचे गिर जाते हैं। इस प्रकार वस्तु पूर्णतया साफ हो जाती है।

2. ब्लॉकों की दरारों का पता लगाने के लिए में पराध्वनि का उपयोग:

धत्विक घटकों को प्रायः बड़े-बड़े भवनों, पुलों, मशीनों तथा वैज्ञानिक उपकरणों को बनाने के लिए उपयोग में लाया जाता है। धातु के ब्लॉकों में विद्यमान दरार या छिद्र जो बाहर से दिखाई नहीं देते, भवन या पुल की संरचना की मशबूती को कम कर देते हैं। पराध्वनि तरंगें धातु के ब्लॉक से गुजारी जाती हैं और प्रेषित तरंगों का पता लगाने के लिए संसूचकों का उपयोग किया जाता है। यदि थोड़ा-सा भी दोष होता है, तो पराध्वनि तरंगें परावर्तित हो जाती हैं जो दोष की उपस्थिति को दर्शाती है|

3. चिकित्सा क्षेत्र में पराध्वनि का उपयोग:

  • इकोकार्डियोग्राफी (ECG): पराध्वनि तरंगों को हृदय के विभिन्न भागों से परावर्तित करा कर हृदय का प्रतिबिंब बनाया जाता है। इस तकनीक को “इकोकार्डियोग्राफी” (ECG) कहा जाता है।
  • अल्ट्रासोनोग्राफी (Ultrasonography):

अल्ट्रासोनोग्राफी एक तकनीक है जिसमें पराध्वनि तरंगे शरीर के उतकों में गमन करती हैं तथा उस स्थान से परावर्तित हो जाती हैं। इसके पश्चात् इन तरंगों को विद्युत संकेतों में परिवर्तित किया जाता है।जिससे उस अंग का प्रतिबिम्ब बना लिया जाता है तथा इन प्रतिबिम्बों को मॉनिटर पर या फिल्म पर मुद्रित कर लिया जाता हैं। यह तकनीक अल्ट्रासोनोग्राफी कहलाती है।

अल्ट्रासोनोग्राफी का उपयोग:

इस तकनीक का उपयोग चिकित्सा क्षेत्र में निम्नलिखित बिमारियो के निदान के लिए किया जाता है।

  • शरीर में उत्पन्न असमान्यताओं का पता लगाने के लिए। जैसे – ट्युमर, पित पथरी, गुर्दे का पथरी, इत्यादि।
  • गर्भाशय संबन्धी बिमारियों के लिए।
  • पेप्टिक अल्सर का पता लगाने के लिए।
  • गुर्दे की पथरी को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ने के लिए:

पराध्वनि का उपयोग गुर्दे की छोटी पथरी को बारीक कणों में तोड़ने वेफ लिए भी किया जा सकता है। ये कण बाद में मूत्र के साथ बाहर निकल जाते हैं।

4. सोनार (SONAR): सोनार (SONAR) शब्द का पूरा नाम Sound Navigation And Ranging है|

सोनार एक युक्ति है। जिसमें जल में स्थित पिंडों की दूरी, दिशा, तथा चाल मापने के लिए पराध्वनि तरंगों का उपयोग किया जाता है। यह एक यंत्र है जिसमें एक प्रेषित्र तथा एक संसूचक होता है और इसे नाव या जहाज में लगाया जाता है।

सोनार तकनीक का उपयोग:

सोनार की तकनीक का उपयोग समुद्र की गहराई ज्ञात करने तथा जल के अंदर स्थित चट्टानो, घाटियों, पनडुब्बियों, हिमशैल, डुबे हुए जहाज आदि की जानकारी प्राप्त  करने के लिए किया जाता है।

5. अपना शिकार पकड़ने के लिए चमगादड़ (Bats) द्वारा पराध्वनि का उपयोग:

चमगादड़ गहन अंधकार में अपने भोजन को खोजने के लिए उड़ते समय पराध्वनि तरंगें उत्सर्जित करता है तथा परावर्तन के पश्चात् इनका संसूचन करता है। चमगादड़ द्वारा उत्पन्न उच्च तारत्व के पराध्वनि स्पंद अवरोधें या कीटों से परावर्तित होकर चमगादड़ के कानों तक पहुँचते हैं। इन परावर्तित स्पंदों की प्रकृति से चमगादड़ को पता चलता है कि अवरोध् या कीट कहाँ पर है और यह किस प्रकार का है पता लगा लेते है और आसानी से अपने शिकार तक पहुँच जाते हैं|

मनुष्य के कान

मनुष्य के कान की संरचना:

कान के तीन भाग होते हैं|

  • बाह्य कर्ण (Exterior Ear): कर्ण पल्लब (pinna) और श्रवण नलिका के भाग को बाह्य कर्ण कहते हैं| यह परिवेश से ध्वनि को एकत्रित करता हैं|
  • मध्य कर्ण (Middle Ear): मध्य कर्ण में, कर्ण पटह और इसमें उपस्थित तीन हड्डियाँ इन्कस (Incus) या anvil , मेलियस (Melleus) या hammer और स्टेपिस (Stepes) या stirrup शामिल है| स्टेपिस (Stepes) मनुष्य के शरीर की सबसे छोटी हड्डी होती है|
  • आतंरिक कर्ण (Interior Ear): कान के इस भाग में कोक्लिया (Cochlea) और श्रवण तंत्रिका (Auditory Nerve) होते हैं|

मनुष्य के कान का कार्य करने की विधि:

बाहरी कान परिवेश से ध्वनि को एकत्रित करता हैं तथा एकत्रित ध्वनि श्रवण नलिका से गुजरती है। श्रवण नलिका के सिरे पर एक पतली झिल्ली होती है जिसे कर्ण पटह कहते है। जब माध्यम के संपीडन कर्ण पटह तक पहुचते है तो झिल्ली के बाहर लगने वाला दाब बढ जाता है और यह कर्ण पटह को अंदर की ओर दबाता हैं, इसी प्रकार विरलन के पहुचने पर कर्ण पटह बाहर की ओर गति करता हैं। इस प्रकार कर्ण पटह कंपन करता है। कर्ण पटह के भीतर मध्य कर्ण में इन्कस, मेलियस, और स्टेपीस नाम की तीन हड्डियाँ इन कंपनों को कई गुना बढा देती हैं। मध्य कर्ण इन ध्वनि तरंगों को आंतरिक कर्ण तक पहुँचा देता है। आंतरिक कर्ण में उपस्थित कर्णावत (कोक्लीया) इन दाब परिवर्तनों को विद्युत संकेतों में बदलकर श्रवण तंत्रिका द्वारा मस्तिष्क तक भेज दिया जाता है।

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