पाठ 15 खाद्य संसाधनों में सुधार

 खाद्य संसाधनों

जिन स्रोतों में हमें भोजन (खाद्य पदार्थ) प्राप्त होते हैं, उनहें खाद्य संसाधन कहते हैं। खाद्य संसाधन मुख्यत: दो प्रकार के होते हैं

  • वनस्पति स्रोत अनाज, दालें, सब्जियाँ, फल, खाद्य, तेल मसाले आदि वनस्पति स्रोतों से प्राप्त खाद्य पदार्थ हैं।
  • जन्तु स्रोत दूध, मांस, अंडे, मछली आदि जन्तु स्रोतों से प्राप्त खाद्य पदार्थ हैं। नियोजन प्रबन्धन तंत्र का आधार है क्योंकि नियोजन में हम सभी चरणों की एक काल्पनिक रूपरेखा तैयार करते हैं। यदि नियोजन विश्वसनीय आँकड़ों तथा वास्तविक स्रोतों के आधार पर नहीं किया जाएगा तो सम्पूर्ण प्रबन्धन तंत्र व्यर्थ हो सकता है।

खाद्य सम्पदा के प्रबन्धन तंत्र में नियोजन के विभिन्न चरण निम्न प्रकार हैं

  • प्रमुख कृषि फसलों के वार्षिक उत्पादन लक्ष्य निर्धारित करना।
  • निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए भविष्य में अतिरिक्त सुविधाएँ प्रदान करना।
  • खाद्य उत्पादनों के संग्रहण, लक्ष्यों तथा तंत्र की रूपरेखा बनाना।
  • समुचित विवरण व्यवस्था सुनिश्चित करना।

फसलों के प्रकार:-

फसलों के प्रकार जिनमें हम निम्नलिखित चीजें प्राप्त करते हैं:-

  • अनाज:- इनमें गेहूँ, चावल, मक्का, बाजरा आदि सम्मिलित हैं। ये हमें कार्बोहाइड्रेट प्रदान करते हैं।
  • बीज:- पौधों में पाये जाने वाले सभी बीज खाने योग्य नहीं होते, जैसे- सेब का बीज, तथा चेरी का बीज। खाने वाले बीजों में सरसों, सोयाबीन, तिल तथा मूँगफली ये हमें वसा प्रदान करते हैं।
  • दालें:- इनमें चना, मटर, (काला चना, हरा चना) तथा मसूर ये हमें प्रोटीन प्रदान करते हैं।
  • सब्जियाँ, मसाले व फल:- ये हमें विटामिन तथा खनिज लवण प्रदान करते हैं।
  • फल जैसे:- सेब, आम, चेरी, केला, तरबूज,
  • सब्जियाँ जैसे:- पालक, पत्तीदार सब्जियाँ, मूली।
  • मसाले जैसे:- मिर्च, काली मिर्च
  • चारा फसलें:- जई, सूडान घास पशुधन के चारे के रूप में उपयोग किया जाता है।

फसल चक्र

  • सभी फसलों को अपनी वृद्धि तथा जीवन चक्र करने के लिये अलग – अलग परिस्थितियों (तापमान, नमी) तथा अलग – अलग दीप्तिकाल (सूरज की रोशनी) की जरूरत होती है।
  • फसलों का मौसम दो प्रकार का होता है।
  • खरीफ फसल:- ये फसल बरसात के मौसम में उगती है। (जून से अक्टूबर तक) उदाहरण:- काला चना, हरा चना, चावल, सोयाबीन, धान।
  • रबी फसल:- ये फसलें नवम्बर से अप्रैल तक के महीने में उगाई जाती है इसलिये इन्हें सर्दी की फसल भी कहते हैं। उदाहरण:- गेहूँ, चना, मटर, सरसों, अलसी, रबी फसलें हैं।

फसल उत्पादन में सुधार

फसल उत्पादन में सुधार की प्रक्रिया में प्रयुक्त गतिविधियों को निम्न प्रमुख वर्गों में बांटा गया है।

  • फसल की किस्मों में सुधार
  • फसल उत्पादन प्रबन्धन
  • फसल सुरक्षा प्रबंधन

संकरण:- विभिन्न अनुवांशिक गुणों वाले पौधों के बीच संकरण करके उन्नत वाले पौधे तैयार करने की प्रक्रिया को संकरण कहते हैं।

फसल की किस्मों में सुधार

  • फसल की किस्म में सुधार के कारक हैं अच्छे और स्वस्थ बीज संकरण।

गुण फसल की गुणवत्ता में वृद्धि करने वाले कारक हैं:-

  • उच्च उत्पादन:- प्रति एकड़ फसल की उत्पादकता बढ़ाना।
  • उन्नत किस्में:- उन्नत किस्में, फसल उत्पादन की गुणवत्ता, प्रत्येक फसल में भिन्न होती है। दाल में प्रोटीन की गुणवत्ता, तिलहन में तेल की गुणवत्ता और फल तथा सब्जियों का संरक्षण महत्वपूर्ण है।
  • जैविक तथा अजैविक प्रतिरोधकता:- जैविक (रोग, कीट तथा निमेटोड) तथा अजैविक (सूखा, क्षारता, जलाक्रांति, गर्मी, ठंड तथा पाला) परिस्थितियों के कारण फसल उत्पादन कम हो सकता है। इन परिस्थितियों को सहन कर सकने वाली फसल की हानि कम हो जाती है।
  • व्यापक अनुकूलता:- व्यापक अनुकूलता वाली किस्मों का विकास करना विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में फसल उत्पादन को स्थायी करने में सहायक होगा। एक ही किस्म को विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न जलवायु में उगाया जा सकता है।
  • ऐच्छिक सस्य विज्ञान गुण:- चारे वाली फसलों के लिये लम्बी तथा सघन शाखाएँ ऐच्छिक गुण है। इस प्रकार सस्य विज्ञान वाली किस्में अधिक उत्पादन प्राप्त करने में सहायक होती हैं।

फसल उत्पादन में सुधार

किसानों के द्वारा की गई विभिन्न प्रकार की तकनीक इस्तेमाल की जाती हैं जिससे फसल के उत्पादन में वृद्धि होती हैं, वे निम्न हैं:-

  • पोषक प्रबन्धन
  • सिंचाई
  • फसल को उगाने के तरीके या फसल पैटर्न

पोषक प्रबन्धन

  • दूसरे जीवों की तरह, पौधों को भी वृद्धि हेतु कुछ तत्वों (पोषक पदार्थों) की आवश्यकता होती है उन तत्त्वों को ही हम पोषक तत्व कहते हैं।
  • जैसे:- कार्बन, पानी से हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन तथा 13 पोषक तत्व मिट्टी से प्राप्त होते हैं।
  • जहाँ से पोषक पदार्थ प्राप्त होते हैं वह है हवा, पानी, मिट्टी
  • वृहत पोषक तत्व:- नाइट्रोजन वायु व भूमि से प्राप्त होती है। जिसकी अधिक मात्रा में पौधों को आवश्यकता होती है। अन्य वृहत पोषक तत्त्व हैं। फॉस्फोरस, पोटेशियम, केल्सियम, मैग्नीशियम, सल्फर
  • सूक्ष्म पोषक तत्व:- लौह तत्व, मैग्नीज की कम मात्रा में आवश्यकता होती है। अन्य हैं बोरोन, जिंक, कॉपर मोलिबिडनम, क्लोरीन।

खाद तथा उर्वरक

मिट्टी की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिये खाद तथा उर्वरक की आवश्यकता होती है। फलस्वरूप फसल की उपज में वृद्धि होती है।

खाद:-

  • ये एक कार्बनिक पदार्थ का अच्छा स्रोत है। यह थोड़ी मात्रा में मिट्टी को पोषक तत्व प्रदान करता है।
  • यह प्राणी के उत्सर्जित पदार्थ या अपशिष्ट से बनता है तथा पौधों के अपशिष्ट के अपघटन द्वारा तैयार किया जाता है।

खाद के विभिन्न प्रकार:-

  • कम्पोस्ट खाद:- पौधों व उनके अवशेष पदार्थों, कूड़े, करकट, पशुओं के गोबर, मनुष्य के मल मूत्र आदि कार्बनिक पदार्थों को जीवाणु तथा कवकों की क्रिया के द्वारा खाद रूप में बदलना कम्पोस्टिंग कहलाता है।
  • वर्मी कम्पोस्ट खाद:- जब कम्पोस्ट को केचुएँ के उपयोग से तैयार करते हैं उसे वर्मी कम्पोस्ट कहते हैं। यहाँ केंचुआ ‘ कृषकों का मित्र ‘ एवं ‘ भूमि की आंत ‘ कहा जाता है।
  • हरी खाद:- फसल उगाने से पहले खेतों में कुछ पौधे, जैसे पटसन, मूँग, अथवा ग्वार उगा देते हैं और तत्पश्चात् उन पर हल चलाकर खेत की मिट्टी में मिला दिया जाता है। ये पौधे हरी खाद में परिवर्तित हो जाते हैं जो मिट्टी को नाइट्रोजन तथा फास्फोरस से परिपूर्ण करने में सहायक होते हैं।

उर्वरक:-

  • उर्वरक कारखानों में तैयार किये जाते हैं। ये रासायनिक पदार्थों के इस्तेमाल से बनाये जाते हैं। इनमें अत्यधिक मात्रा में पोषक तत्व जैसे:- नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटैशियम पाये जाते हैं।
  • उर्वरक आसानी से पौधों द्वारा अवशोषित कर लिये जाते हैं तथा ये पानी में घुलनशील होते हैं।

खाद तथा उर्वरक में अन्तर

खाद

उर्वरक

ये मुख्य रूप से कार्बनिक पदार्थ होते हैं। ये अकार्बनिक पदार्थ होते हैं।
ये प्राकृतिक पदार्थ के बने होते हैं। ये रासायनिक पदार्थों से मिलकर बनते हैं।
खाद में कम मात्रा में पोषक तत्व होते हैं। उर्वरक में अत्यधिक मात्रा में पोषक तत्व पाये जाते हैं।
खाद सस्ती होती है तथा घर तथा खेत (मैदान) में बनायी जा सकती है। उर्वरक महँगे तथा फैक्ट्रियों में तैयार किये जाते हैं।
खाद धीरे – धीरे पौधे द्वारा अवशोषित की जाती है। क्योंकि ये पानी में अघुलनशील होते हैं। उर्वरक आसानी से फसल को उपलब्ध हो जाते हैं। ये पानी में घुलनशील होते हैं।
इसका आसानी से भंडारण तथा स्थानान्तरण किया जा सकता है। इसका भंडारण तथा स्थानांतरण सरल विधि से नहीं किया जा सकता।

सिंचाई

फसलों को जल प्रदान करने की प्रक्रिया को सिंचाई कहते हैं।

सिंचाई के तरीके:-

  • कुएँ:- ये दो प्रकार के होते हैं:-
  • खुदे हुए कुएँ या खोदे कुएँ:- पानी बैलों के उपयोग या पम्प द्वारा निकाला जाता है।
  • नलकूप:- नलकूप में बहुत नीचे पानी होता है। जिससे सिंचाई होती है। मोटर पम्प के इस्तेमाल से पानी ऊपर लाया जाता है।
  • नहरें:- इनमें पानी एक या अधिक जलाशयों अथवा नदियों से आता है। मुख्य नहर से शाखाएँ निकलती हैं जो विभाजित होकर खेतों में सिंचाई करती है।
  • नदी उन्नयन प्रणाली:- इस प्रणाली में पानी सीधे नदियों से ही पम्प द्वारा इकट्ठा कर लिया जाता है। इस सिंचाई का उपयोग नदियों के पास वाली खेती में लाभदायक रहता है।
  • तालाब:- आपत्ति के समय प्रयोग में आने वाले वे छोटे तालाब, छोटे जलाशय होते हैं, जो छोटे से क्षेत्र में पानी का संग्रह करते हैं।
  • पानी का संरक्षण:- वर्षा के पानी को सीधे किसी टैंक में सुरक्षित इकट्ठा कर लिया जाता है बाद में इस्तेमाल के लिये, ये मृदा अपरदन को भी दूर करता है।

वर्षा जल संग्रहण:-

वह प्रक्रिया जिसमें पृथ्वी पर गिरने वाले वर्षा जल को रोका जाता है और भूमि मे रिसने के लिए तैयार किया जाता है। वर्षा जल संग्रहण कहलाती हैं।

फसल पैटर्न:-

फसल की वृद्धि हेतु अलग – अलग प्रकार के तरीके अपनाए जाते हैं जिससे कि नुकसान कम से कम तथा उपज अधिक से अधिक हो।

  • मिश्रित खेती
  • अंतराफसलीकरण
  • फसल चक्र

मिश्रित खेती:-

  • दो या दो से अधिक फसल को एक साथ उगाना एक ही भूमि में) मिश्रित खेती कहलाती है।
  • उदाहरण:- गेहूँ और चना, गेहूँ और सरसों, मूँगफली तथा सूरजमुखी
  • मिश्रित फसल की खेती करने से हानि होने की संभावना कम हो जाती है क्योंकि फसल के नष्ट हो जाने पर भी फसल उत्पादन की आशा बनी रहती है।

अंतराफसलीकरण:-

  • अंतराफसलीकरण में दो या दो से अधिक फसलों को एक साथ एक ही खेत में निर्दिष्ट पैटर्न प उगाते हैं। कुछ पंक्तियों में एक प्रकार की फसल तथा उनके एकांतर में स्थित दूसरी पंक्तियों में दूसरी प्रकार की फसल उगाते हैं।

उदाहरण:- सोयाबीन + मक्का, बाजरा + लोबिया

फसल चक्र:-

  • किसी खेत में क्रमवार पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार विभिन्न फसलों के उगाने को फसल चक्र कहते हैं।
  • अगर बार – बार एक ही खेत में एक ही प्रकार की खेती की जाती है तो एक ही प्रकार के पोषक तत्व मृदा से फसल द्वारा प्राप्त किये जाते हैं। बार – बार मृदा से पोषक तत्व फसल द्वारा प्राप्त करने पर एक ही प्रकार के पोषक तत्व समाप्त हो जाते हैं। अतः हमें अलग – अलग प्रकार की खेती करनी चाहिये।

विशेषताएँ:-

  • मिट्टी की गुणवत्ता बनी रहती है।
  • ये कीट तथा खरपतवार को नियन्त्रित रखते हैं।
  • एक बार मिट्टी को उपजाऊ बनाने के बाद कई प्रकार की फसल सुचारु रूप से उगाई जा सकती है।

फसल सुरक्षा प्रबन्धन:-

रोग कारक जीवों तथा फसल को हानि पहुँचाने वाले कारकों से फसल को बचाना ही फसल संरक्षण है। इस प्रकार की कठिनाइयों से बचने के लिये नीचे दिये गये तरीके इस्तेमाल किये जाते हैं।

  • फसल की वृद्धि के समय कीट व पीड़क नाशी जीवों से
  • अनाज के भण्डारण के समय

पीडकनाशी:-

जीव जो फसल को खराब कर देते हैं। जिससे वह मानव उपयोग के लायक नहीं रहती, पीड़क कहलाते हैं।

पीड़क कई प्रकार के होते हैं:-

  • खरपतवार:- फसल के साथ – साथ उगने वाले अवांछनीय पौधे ‘ खर पतवार ‘ कहलाते हैं। उदाहरण:- जेन्थियम, पारथेनियम।
  • कीट:- कीट विभिन्न प्रकार से फसल तथा पौधों को नुकसान पहुँचाते हैं। वे (कीट) जड़, तना तथा पत्तियों को काट देते हैं। पौधों के विभिन्न भागों के कोश रस को चूसकर नष्ट कर देते हैं।
  • रोगाणु:- कोई जीव जैसे बैक्टीरिया, फंगस तथा वायरस जो पौधों में बीमारी पैदा करते हैं। रोगाणु कहलाते हैं। ये फसल में पानी, हवा, तथा मिट्टी द्वारा पहुँचते हैं।

अनाज का भण्डारण:-

पूरे साल मौसम के अनुकूल भोजन प्राप्त करने के लिये, अनाज को सुरक्षित स्थान पर रखना अनिवार्य है, परन्तु भण्डारण के समय अनाज कितने ही कारणों से खराब और व्यर्थ हो जाता है जैसे:-

  • जैविक कारक:- जीवित प्राणियों के द्वारा जैसे – कीट, चिड़िया, चिचडी, बैक्टीरिया, फंगस (कवक)
  • अजैविक कारक:- निर्जीव कारकों द्वारा जैसे नमी, तापमान में अनियमितता आदि।

ये कारक फसल की गुणवत्ता तथा भार में कमी, रंग में परिवर्तन तथा अंकुरण के निम्न क्षमता के कारण हैं।

कार्बनिक खेती

कीटनाशक तथा उर्वरक का प्रयोग करने के अपने ही दुष्प्रभाव हैं। ये प्रदूषण फैलाते हैं लम्बे समय के लिये मिट्टी की उपजाऊ गुणवत्ता को कम करते हैं जो हम अनाज, फल तथा सब्जियाँ प्राप्त करते हैं उनमें हानिकारक रसायन मिले होते हैं।

ऑरगेनिक खेती में न या न के बराबर कीटनाशक तथा उर्वरक का इस्तेमाल किया जाता है।

अनाज को सुरक्षित भंडारग्रह तक पहुँचाने से पहले अनाज को सुरक्षित रखने के विभिन्न उपाय जो कि भविष्य में इस्तेमाल हों, वे निम्नलिखित हैं:-

  • सुखाना:- सूरज की रोशनी में अच्छी तरह से सुखा लेने चाहिये।
  • सफाई का ध्यान रखना:- अनाज में कीड़े नहीं होने चाहिये, गोदामों को अच्छी तरह से साफ कर लेना चाहिये। छत, दीवार तथा फर्श में कहीं अगर दरार है तो उनकी अच्छी तरह से मरम्मत कर देनी चाहिये।
  • धूमक:- गोदाम तथा भंडारण गृह पर जिस बीज में कवक नाशी व कीटनाशी का प्रयोग करना आवश्यक होता है।
  • भंडारण उपकरण:- कुछ भंडारण उपकरण जैसे पूसाधानी, पूसा कोठार, पंत कुठला आदि

उपकरण एवं संरचनाएँ अपनानी चाहिये। साफ तथा सूखे दाने को प्लास्टिक बैग में सुरक्षित रखना चाहिये। तो इनमें वायु, नमी, तापक्रम का प्रभाव नहीं होता बाहर के वातावरण का कोई प्रभाव नहीं होता।

पशुपालन:-

घरेलू पशुओं को वैज्ञानिक ढंग से पालने को कहते हैं। ये पशुओं के भोजन, आवास, नस्ल सुधार, तथा रोग नियंत्रण से सम्बन्धित है।

पशु कृषि का मुख्य उद्देश्य:-

  • दुग्ध प्राप्त करने के लिये।
  • कृषि कार्य करने के लिए।
  • खेत को जोतने के लिये।
  • यातायात में प्रयोग हेतु।

पशु कृषि के प्रकार:-

  • गाय – बॉस इंडिकस
  • भैंस – बुबेलस बुबेलिस
  • दूध देने वाली मादा:- इनमें दूध देने वाले जानवर सम्मिलित होते हैं जैसे:- मादा पशु।
  • हल चलाने वाले जानवर (नर):- ये जानवर जो दुग्ध नहीं देते तथा कृषि में कार्य करते हैं जैसे:- हल चलाना, सिंचाई, बोझा ढोना।
  • दुग्ध स्त्रवन काल:- जन्म से लेकर अगली गर्भधारण के बीच के समय से जो दुग्ध उत्पादन होता है, उसे दुग्ध स्त्रवण काल कहते हैं।

पशु की देखभाल:-

सफाई:-

  • पशुओं की सुरक्षा के लिये हवादार तथा छायादार स्थान होना चाहिए।
  • पशुओं की चमड़ी की लगातार कंघी ब्रशिंग होनी चाहिये।
  • पानी इकट्ठा न हो इसके लिये ढलान वाले पशु आश्रय होने चाहिये।

भोजन:-

  • भूसे में मुख्य रूप से फाइबर (रेशा) होना चाहिये।
  • गाढ़ा प्रोटीन होना चाहिये।
  • दूध की मात्रा बढ़ाने के लिये खाने में विटामिन तथा खनिज होने चाहिये।

बीमारी से बचाव:-

  • पशुओं की मृत्यु हो सकती है, जो दुग्ध उत्पादन को प्रभावित कर सकते हैं। एक स्वस्थ पशु नियमित रूप से खाता है और ठीक ढंग से बैठता व उठता है। पशु के बाह्य परजीवी तथा अंतः परजीवी दोनों ही होते हैं।
  • बाह्य परजीवी द्वारा त्वचा रोग हो सकते हैं। अतः परजीवी, अमाशय, आँत तथा यकृत को प्रभावित करते हैं।

बचाव:-

रोगों से बचाने के लिये पशुओं को टीका लगाया जाता है। ये रोग बैक्टीरिया तथा वाइरस के कारण होते हैं।

कुक्कुट (मुर्गी) पालन:-

अण्डे तथा कुक्कुट मास के उत्पादन को बढ़ाने के लिये मुर्गी पालन किया जाता है। दोनों हमारे भोजन में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाते हैं।

ब्रोलर्स:-

जब चूजों को माँस के लिये पाला जाता है, तो उसे ब्रोलर्स कहते हैं। ये जन्म के 6.8 हफ्तों के अन्दर इस्तेमाल किये जाते हैं।

लेअर:-

जब कुक्कुट को अण्डों के लिये पाला जाता है उसे लेअर कहते हैं। ये जन्म के 20 हफ्तो बाद इस्तेमाल किये जाते हैं, जब ये लैंगिक परिपक्वता के लायक हो जाते हैं, जिसके फलस्वरूप अण्डे प्राप्त होते हैं।

मुर्गी उत्पादन:-

मुर्गियों की निम्नलिखित विशेषताओं के कारण संकरण करके नई – नई किस्में विकसित की जाती हैं।

चूजों की संख्या अधिक व किस्म अच्छी होती है।

  • कम खर्च में रख – रखाव।
  • छोटे कद के ब्रोलर माता – पिता द्वारा चूजों के व्यावसायिक उत्पादन हेतु।
  • गर्मी अनुकूलन क्षमता।
  • उच्च तापमान को सहने की क्षमता।

मछली उत्पादन:-

हमारे भोजन में प्रोटीन का मछली मुख्य स्रोत है। मछली का उत्पादन दो प्रकार से होता है।

  • पंखयुक्त मछलियाँ:- स्वच्छ जल में कटला, रोहू, मृगल, कॉमन कार्य का सवर्धन किया जाता है।
  • कवचीय मछलियाँ:- जैसे:- प्रॉन, मोलस्का सम्मिलित है।

मधुमक्खी पालन:-

यह वह अभ्यास है जिसमें मधुमक्खियों की कॉलोनी को बड़े पैमाने पर रखा व संभाला जाता है और उनकी देखभाल करते हैं, ताकि बड़ी मात्रा में शहद तथा मोम प्राप्त हो सके।

अधिकतर किसान मधुमक्खी पालन अन्य आय स्रोत के लिये इस्तेमाल करते हैं। मधुक्खी पालन या ऐपिअरीस बहुत बड़ी प्रकार है।

ऐपिअरी:-

ऐपिअरी एक ऐसी व्यवस्था है जिससे अधिक मात्रा में मधुमक्खी के छत्ते मनचाही जगह पर अनुशासित तरीके से इस प्रकार रखे जाते हैं कि इससे अधिक मात्रा में मकरंद तथा पराग एकत्र हो सकें।

भारत में मधुमक्खी के प्रकार:-

कुछ भारतीय मधुमक्खी के प्रकार निम्नलिखित हैं:-

  • एपिस सेरेना इनडिंका सामान्य भारतीय मधुमक्खी।
  • एपिस डोरसेटा (एक शैल मधुमक्खी), एपिस फ्लोरी (छोटी मधुमक्खी)

यूरोपियन मधुमक्खी भी भारत में इस्तेमाल की जाती है इसका नाम है एपिस मेलिफेरा।

इस मधुमक्खी के निम्न लाभ हैं:-

  • ज्यादा शहद एकत्रित करने की क्षमता।
  • जल्दी प्रजनन क्षमता
  • कम डंक मारती है।
  • वे लम्बे समय तक निर्धारित छत्ते में रह सकती है।

शहद:-

  • यह एक गाढ़ा, मीठा तरल पदार्थ है।
  • यह औषधीय प्रयोग में लाया जाता है तथा शर्करा के रूप में भी प्रयोग होता है।
  • इसे ताकत (ऊर्जा) प्राप्त करने के लिये भी इस्तेमाल किया जाता है।

चरागाह:-

मधुमक्खियाँ जिन स्थानों पर मधु एकत्रित करती हैं उसे मधुमक्खी का चरागाह कहते हैं। मधुमक्खी पुष्पों से मकरन्द तथा पराग एकत्र करती हैं।

चरागाह के पुष्पों की किस्में शहद के स्वाद तथा गुणवत्ता को प्रभावित करती है। उदाहरण:- कश्मीर का बादाम शहद बहुत स्वादिष्ट होता है।

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