पाठ – 5

किस तरह आखिरकार मैं हिंदी में आया

-शमशेर बहादुर सिंह

सारांश

इस कहानी के लेखक शमशेर बहादुर सिंह जी हैं।इस कहानी में लेखक ने अपने जीवन के उन तमाम घटनाक्रमों का जिक्र किया है जिसके फलस्वरूप उन्होंने हिंदी साहित्य जगत में कदम रखा और हिन्दी लेखन कार्य आरंभ किया और खूब सारी कविताएं, निबंध और कहानियां लिखकर प्रसिद्धि कमाई। अपने इस लेख में लेखक ने श्री हरिवंश राय बच्चनजी, सुमित्रानंदन पंतजी, निरालाजी का दिल से आभार प्रकट किया है।

कहानी की शुरुआत करते हुए लेखक शमशेर बहादुर जी कहते हैं कि वो जिस स्थिति में थे उसी स्थिति में अपने घर से पहली बस पकड़कर दिल्ली के लिए रवाना हो गए। दिल्ली पहुंच कर  उन्होंने तय किया कि उन्हें कोई न कोई काम अवश्य करना है। इसीलिए वो अपनी इच्छानुसार पेंटिंग की शिक्षा लेने “उकील आर्ट स्कूल” पहुंचे। परीक्षा में सफल होने के कारण उन्हें बिना फीस दिए ही वहाँ प्रवेश मिल गया।

लेखक ने करोलबाग में सड़क किनारे एक कमरा किराए में लिया और वहीं से वो पेंटिंग सीखने कनाट प्लेस जाते थे। पेंटिंग क्लास जाने और आने के रास्ते में वो अपना अधिकतर समय कभी ड्राइंग बनाकर तो कभी कविताएं लिखकर गुजारा करते थे।

हालाँकि उन्हें इस बात का जरा भी आभास नहीं था कि कभी उनकी कविताएं प्रकाशित होगी। आर्थिक हालत अच्छे न होने के कारण कभी-कभी लेखक के बड़े भाई तेज बहादुर उन्हें कुछ रुपए भेज देते थे और कुछ रुपए लेखक स्वयं साइन बोर्ड पेंट करके भी कमा लेते थे।

कुछ समय बाद लेखक के एक तीस-चालीस वर्ष के महाराष्ट्रीयन पत्रकार मित्र उनके साथ आकर रहने लगे।लेखक उस वक्त कभी कविताएं और कभी उर्दू में गजल के कुछ शेर भी लिख लिया करते थे।

लेखक की पत्नी का देहांत टी.बी नामक बीमारी के कारण हो चुका था। इसीलिए वो अपने आप को बिल्कुल अकेला महसूस करते और दुखी रहते थे। पेंटिंग करना, कविताएं लिखना, उनका जीवन बस इन्हीं तक सीमित रह गया था।

एक बार लेखक अपनी क्लास खत्म होने के बाद घर जा चुके थे। तब बच्चन जी उनके स्टूडियो में आए और लेखक को वहां ना पाकर उनके नाम एक नोट छोड़ कर चले गए। लेखक कहते हैं कि उनकी एक बहुत बुरी आदत थी कि वह कभी भी किसी के भी पत्रों का जवाब नहीं देते थे। लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने बच्चन जी के लिए एक अंग्रेजी का सॉनेट लिखा। लेकिन वह उसे बच्चन जी को भेज नहीं पाए।

इसके बाद लेखक अपनी ससुराल देहरादून आ गए। जहां उन्होंने एक केमिस्ट की दुकान में कंपाउंडरी सीखी। और एक दिन अचानक उन्होंने अंग्रेजी में लिखा अपना वह सॉनेट बच्चन जी को भेज दिया।

बात सन 1937 की हैं जब बच्चनजी गर्मियों की छुट्टियों में देहरादून आए और बृज मोहन गुप्ता के यहां ठहरे। और फिर एक दिन वो बृज मोहन गुप्ता के साथ उनकी केमिस्ट की दुकान में आकर उनसे मिले। लेखक बताते हैं कि उस दिन मौसम खराब था और आँधी आने के कारण वो एक गिरते पेड़ के नीचे आते-आते बच गए।

इस छोटी सी मुलाकात में लेखक का बच्चन जी के साथ एक व्यवहारिक रिश्ता जुड़ गया था ।लेखक कहते हैं कि बच्चनजी की पत्नी का भी देहांत हो चुका था। इसीलिए वो भी बहुत दुखी रहते थे। उनकी पत्नी उनके सुख-दुख की संगिनी थी। वह विशाल हृदय की मलिक्का व बात की धनी महिला थी।

लेखक की मनोदशा देखकर बच्चनजी ने उन्हें इलाहाबाद आकर पढ़ने की सलाह दी और उनकी बात मान कर लेखक इलाहाबाद पहुंच गए। बच्चन जी ने लेखक को M.A में प्रवेश दिला दिया।

इलाहाबाद में लेखक को बच्चनजी व उनके परिवार से बहुत सहयोग मिला। बच्चनजी के पिताजी ने लेखक को उर्दू-फारसी की सूफी नज्मों का एक संग्रह भी भेंट किया। बच्चनजी ने स्वयं भी M.A अंग्रेजी विषय से किया था लेकिन उन्होंने नौकरी नहीं की। लेखक का भी सरकारी नौकरी के प्रति कोई रुझान नहीं था। इसीलिए वो भी सरकारी नौकरी से दूर ही रहे।

लेखक आगे कहते हैं कि श्री सुमित्रानंदन पंतजी की सहायता से उन्हें “हिंदू बोर्डिंग हाउस” के कॉमन रूम में एक सीट फ्री मिल गई थी।और इसी के साथ ही उन्हें पंत जी की सहायता से “इंडियन प्रेस” में अनुवाद का काम भी मिल गया था।

यहीं से लेखक ने हिंदी कविताओं व लेखन कार्य को गंभीरता से लेना आरंभ किया। लेखक के परिवार में उर्दू का माहौल होने के कारण उन्हें उर्दू का अच्छा ज्ञान था। लेकिन उनका हिंदी लिखने का अभ्यास बिल्कुल ही छूट चुका था।बच्चन जी की मदद से उन्होंने पुन: हिंदी लिखने में महारत हासिल की।

उनकी कुछ रचनाएं “सरस्वती” और “चाँद” में भी छप चुकी थी। “अभ्युदय” में छपा उनका एक “सॉनेट” बच्चन जी को बहुत पसंद आया। लेखक कहते हैं कि उन्हें पंतजी और निरालाजी ने हिंदी की ओर आकर्षित किया । अब बच्चनजी भी हिंदी में लेखन कार्य शुरू कर चुके थे।

लेखक को लगा कि अब उन्हें भी हिंदी में लेखन कार्य करने के लिए कमर कस लेनी चाहिए। लेखक लाख कोशिशों के बाद भी M.A. नहीं कर पाए जिसका बच्चनजी को बहुत दुख था।

लेखक ने अब हिंदी कवितायें लिखनी आरम्भ की और उनके प्रयास सार्थक भी हो रहे थे। “सरस्वती” पत्रिका में छपी लेखक की एक कविता ने निराला जी का ध्यान खींचा। इसी के साथ ही  लेखक ने कुछ और निबंध भी लिखें।

लेखक के अनुसार उनके हिंदी साहित्य जगत में फलने फूलने के पीछे बच्चनजी का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

लेखक कहते हैं कि बाद में वो निश्चित रूप से बच्चन जी से दूर ही रहे क्योंकि उन्हें चिट्ठी-पत्री तथा मिलने जुलने में अधिक विश्वास नहीं था लेकिन बच्चनजी हमेशा उनके बहुत निकट रहे।

लेखक कहते हैं कि बच्चनजी का व्यक्तित्व उनकी श्रेष्ठ कविताओं से भी बहुत बड़ा व अद्भुत है। बच्चनजी जैसे व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति इस दुनिया में कम ही होते हैं।

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