पाठ – 3

योग और जीवन शैली

In this post, we have given the detailed notes of class 12 Physical Education chapter 3 योग और जीवन शैली (Yoga and Lifestyle) in Hindi. These notes are useful for the students who are going to appear in class 12 board exams.

इस पोस्ट में क्लास 12 के शारीरिक शिक्षा के पाठ 3 योग और जीवन शैली (Yoga and Lifestyle) के नोट्स दिये गए है। यह उन सभी विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है जो इस वर्ष कक्षा 12 में है एवं शारीरिक शिक्षा विषय पढ़ रहे है।

योगा का अर्थ

  • ‘ योग ‘ शब्द संस्कृत भाषा के ‘ युज ‘ शब्द से लिया गया है , जिसका अर्थ है जोड़ना या मिलाना। योग एक संपूर्ण जीवन – शैलो अथवा साधना है जिससे व्यक्ति को अपने मन मस्तिष्क तथा स्वयं पर नियंत्रण करने में सहायता मिलती है।
  • मन पर नियंत्रण करके तथा शरीर को स्वस्थ रखकर व्यक्ति परम आनंद का अनुभव कर सकता है। इस प्रकार यह माना जाता है कि , योग सभी प्रकार के दुख एवं पीड़ा को नष्ट करता है।

योग की परिभाषाएं

  • पतंजलि के अनुसार:-
    “ योग का अर्थ है मानसिक उतार – चढ़ाव पर नियंत्रण पाना।
  • भगवत गीता के अनुसार :-
    ” योग पीड़ा तथा दुख से मुक्ति का मार्ग है । “
  • भारती कृष्ण के अनुसार :-
    “ भगवान से व्यक्ति की एकता ही योग है । “

योग के अंग

योग के आठ अंग होते हैं जिन्हें अष्टांग कहा जाता है जो निम्नलिखित प्रकार के हैं:-

  • यम
  • प्रत्याहार
  • आसन
  • ध्यान
  • नियम
  • समाधि
  • प्राणायाम
  • धारणा

आसन का अर्थ

  • आसन योग का तीसरा अंग है। आसन ( Posture ) का अर्थ है- लंबे समय तक सुखपूर्वक बैठने की स्थिति; दूसरे शब्दों में कहें तो आसन शरीर की वह स्थिति है जिसमें शरीर को सरलतापूर्वक रखा जा सकता है।
  • आसन में शरीर को अनेक प्रकार की स्थितियों में इस तरह से रखा जाता है जिससे शरीर के अंगों तथा ग्रंथियों की क्रिया पहले की अपेक्षा बेहतर होकर शरीर तथा मन को स्वस्थ बना सके।

आसन की परिभाषाएं

  • ब्रह्मा उपनिषद के अनुसार :-
    ‘‘ आरामदायक मुद्रा में दीर्घ अवधि तक बैठने को आसन कहते हैं। ’’
  • एलफोडड और नीट के अनुसार :-
    ‘‘ स्थिर सुखं आसनम् ’’ अर्थात स्थिर और आरामदायक मुद्रा ही आसन है।

आसनों का वर्गीकरण :-

1) ध्यानात्मक आसन:-

  • इस प्रकार के आसन मन को शांत करने के लिए अथवा एकाग्रता बढ़ाने के लिए तथा ध्यान शक्ति ( Meditation Power ) में वृद्धि के लिए किये जाते है । पद्मासन , सिद्धासन व समासन आदि ध्यानात्मक आसान के उदाहरण हैं। इन्हीं आसनों में स्थिर होकर ध्यान किया जाता है।

2) विश्रामात्मक आसन ( Relaxative Asanas ) :-

  • अपने नाम के अनुरूप यह आसन थकावट दूर करने के लिए एवं शरीर में ऊर्जा का संचार करने के लिए किए जाते हैं। इन आसनों को करने से व्यक्ति शारीरिक व मानसिक रूप से शिथिल ( Relax ) महसूस करता है। शवासन व मकरासन विश्रामात्मक आसन के उदाहरण हैं।

3) संवर्धनात्मक आसन ( Corrective Asanas ) :-

  • इस प्रकार के आसनों का अभ्यास शारीरिक विकास तथा शरीर की सभी क्रियाओं को व्यवस्थित करने के लिए किया जाता है। शीर्षासन , सर्वांगासन , मत्स्यासन , हलासन , भुजंगासन , शलभासन , धनुरासन , चक्रासन , मयूरासन व सिंहासन आदि संवधर्नात्मक आसन के उदाहरण हैं।

मोटापे से बचाव तथा नियंत्रण में लाभकारी योगासन

1) वज्रासन :-

विधि –

पूर्व स्थिति : दोनों पैरो को सामने की ओर सीधे रखकर बैठे जाएँ।

  • दायें पैर को घुटने से मोड़कर दायें नितम्ब के नीचे रखें।
  • बायें पैर को घुटने से मोड़कर बायें नितम्ब के नीचे रखें।
  • कमर , गर्दन एवं सिर को सीधा रखते हुए दोनों पैरों पर इस प्रकार बैठे कि एड़ी खुली हुई तथा दोनों पैर के अंगूठे आपस में मिल जाए।
  • इस दौरान घुटने तथा पैर का निचला भाग जमीन से लगा रहे।
  • दोनों हाथों को जंघाओं पर रखे तथा दृष्टि सामने की ओर भूमध्य में अथवा आँखों को कोमलता से बंद रखे।

लाभ –

  • पिंडली और जंघाओं के लिए उत्तम है ।
  • उपापचय की प्रक्रिया को ठीक करता है ।
  • शरीर को सुडौल बनाता है ।
  • वजन कम करने में मददगार है ।

विपरीत संकेत/सावधानियां –

  • जोड़ों के दर्द से पीड़ित व्यक्ति इसे न करें ।
  • एड़ी के दर्द से पीड़ित व्यक्ति इसे न करें ।
  • इस आसन को करने से यदि कमर दर्द , कमजोरी या चक्कर आने जैसी समस्या हो तो कुछ के लिए इस आसन को बंद कर अपने डॉक्टर से परामर्श लें ।

2)हस्तासन :-

विधि –

पूर्व स्थिति पैर मिलाकर सीधे खड़े हो जाएँ ।

  • नासिकाओं से श्वास भरते हुए , दोनों हाथों को सामने से उठाते हुए ऊपर ले जाएँ ।
  • शरीर को ऊपर की ओर खिंचाव करें ।
  • श्वास निकालते हुए धीरे – धीरे नीचे लाएं। कमर को झुकाते हुए दोनों हाथों को पैरों के पास जमीन पर टिका दें। श्वास सामान्य करें।
  • यथास्थिति रोके तथा पूर्व स्थिति में आ जाएँ ।
  • समय : 30 सेकेण्ड से 2 मिनट तक ।

लाभ –

  • मस्तिष्क को शांत करता है और तनाव व हल्के अवसाद में राहत देता है ।
  • हृदय और गुर्दों को कुशल ढंग से कार्य करने में मदद करता है ।
  • हैमस्ट्रिंग , पिंडली और कूल्हों में जरूरी खिंचाव पैदा करता है ।

सावधानियाँ /विपरीत संकेत –

  • पीठ दर्द या चोट लगी हो , तो इस आसन को न करें ।

3) त्रिकोणासन :-

विधि :-

  • दोनों पैरों के बीच में लगभग डेढ़ फुट का अंतर रखते हुए सीधे खड़े हो जाएँ । दोनों हाथ कंधों के समानांतर पाश्र्व भाग में खुले हुए हों ।
  • श्वास अंदर भरते हुए बायें हाथ को सामने से लेते हुए पंजे के पास भूमि पर टिका दें , अथवा हाथ को एड़ी के पास लगाए तथा दायें हाथ को ऊपर की तरफ उठाकर गर्दन को दायीं और घुमाते हुए दायें हाथ को देखें ।

लाभ :-

  • यह आसन करने में गर्दन , पीठ , कमर और पैर के स्नायु मजबूत होते हैं ।
  • शरीर का संतुलन ठीक होता है।
  • पाचन प्रक्रिया ठीक होती है।

सावधानियां/विपरीत संकेत –

  • यदि आपको डायरिमा , निम्न या उच्च रक्तचाप , पीठ की चोट या माइग्रेन की शिकायत हो , त्रिकोणासन के अभ्यास से दूर रहें।
  • जिन्हें सरवाइकल स्पोंडिलाइटिस हो , उन्हें इस आसन को नहीं करना चाहिए ।

मधुमेह के बचाव तथा नियंत्रण में लाभकारी योगासन

1) भुजंगासन :-

विधि –

  • दोनों पैरों को आपस में मिलाकर पीछे की ओर अधिक – से – अधिक खिंचाव दें ।
  • दोनों हाथों को कोहनियों से मोड़कर कंधों के नीचे रखें ।
  • अंगुलिया बाहर की ओर तथा आपस में मिली हुई हो ।
  • श्वास भरते हुए , छाती के भाग को धीरे – धीरे उठाएँ।
  • सिर तथा गर्दन को भी ऊपर की ओर खिंचाव दें ।
  • श्वास छोड़ते हुए पूर्व स्थिति में आ जाएँ ।
  • अधिक देर तक रूकने पर श्वास सामान्य कर सकते हैं ।
  • यह आसन 30 सेकेण्ड से 3 मिनट क कर सकते हैं ।

लाभ –

  • शरीर में रक्त संचार ठीक करताa है जिससे कार्यक्षमता बढ़ती है ।
  • गर्दन व कमर दर्द से छुटकारा मिलता है ।
  • फेफड़ों की शक्ति का विकास होता है जिससे ऑक्सीजन की उचित मात्रा में पूर्ति होती है ।
  • मांसपेशियों व हड्डियों को लचीला बनाता है ।

सावधानियां/विपरीत संकेत –

  • उन व्यक्तियों को जिन्हें हर्निया , पीठ की चोटें , सिरदर्द तथा हाल ही में उदरीय सर्जरी हुई हो उन्हें इस आसन को नहीं करना चाहिए ।
  • गर्भवती महिलाओं को यह आसन नहीं करना चाहिए ।

2) पश्चिमोत्तानासन :-

विधि –

  • पश्चिमोत्तानासन बैठकर शुरू किया जाता है ।
  • अपने पैरों को सीधा , जोड़कर अपने सामने खींचते हुए रखें । दोनों पैरों का रुख छत की तरफ हो ।
  • ध्यान दें कि बैठते समय आपकी रीढ़ की हड्डी सीधी हो । कई लोगों को इस बिंदु पर यह फायदा होता है कि नीचे से मांस को खत्म कर देता है जिससे कि आपकी रीढ़ में घुमाव आए ।
  • श्वास अंदर लेते समय अपनी बाँहों को सिर में ऊपर की ओर खींचें । हाथों की दिशा के अनुरूप ही अपनी पूरी रीढ़ को खींचे ।

लाभ –

  • यह पैरों को मजबूत बनाता है ।
  • रीढ़ में खिंचाव पैदा करता है ।
  • मस्तिष्क को शांत रखता है ।
  • तंत्रिका तंत्र को ठीक कर एकाग्रता बढ़ाता है ।

सावधानियां/विपरीत संकेत –

  • ऐसे लोगों को पश्चिमोत्तानासन नहीं करनी चाहिए जिनके पेट में अल्सर की शिकायत हो ।
  • ध्यान रहे , इस योग को हमेशा खाली पेट ही करनी चाहिए ।
  • अगर आपके आंत में सूजन हो तो इसका अभ्यास बिल्कुल न करें ।

3) पवनमुक्तासन :-

विधि –

  • शरीर के नितम्ब भाग के सहारे जमीन पर लेट जाएँ ।
  • दोनों हाथों से दोनों घुटनों को मोड़कर छाती पर रखें ।
  • सांस छोड़ते समय दोनों घुटनों को हाथों से दबाकर छाती से लगाएँ तथा सिर को उठाते हुए घुटनों से नासिका ( Nose ) से छुएँ ।
  • 10 से 30 सेकेण्ड सांस को बाहर रोकते हुए इसी स्थिति में रहकर फिर पैरों को सीधा कर यह आसान 2 से 5 बार तक करें ।
  • 30 सेकेण्ड से 2 मिनट ।

लाभ –

  • इस आसन का पूरा प्रभाव पेट पर पड़ता है अतः पेट की पाचन , अवशोषण व निष्कासन की क्रियाओं को ठीक करता है ।
  • शरीर में उत्पन्न वायु पर नियन्त्रण करता है तथा अपान वायु का निष्कासन आसानी से होता है ।
  • घुटनों के जोड़ों में लचीलापन उत्पन्न करता है ।

सावधानियां/विपरीत संकेत

  • कमर दर्द की स्थिति में इस आसन का अभ्यास न करें ।
  • घुटने में दर्द होने पर इस आसन को न करें ।
  • भोजन के तुरंत बाद यह आसन कदापि न करें ।
  • इस आसन को उन्हें भी नहीं करनी चाहिए जिनके गर्दन में दर्द हो ।

अस्थमा के बचाव तथा नियंत्रण में लाभकारी योगासन

1) चक्रासन :-

विधि –

  • दोनों पैरों को घुटनों से मोड़कर एड़ियों से नितम्बों को स्पर्श करते हुए रखें ।
  • दोनों हाथों को मोड़कर कन्धों के पीछे रखें । हाथों के पंजे अन्दर की ओर मुड़े रहें ।
  • हाथों और पैरों के ऊपर पूरे शरीर को धीरे – धीरे ऊपर उठा दें ।
  • हाथ और पैरों में आधे फुट का अन्तर रहे तथा सिर दोनों हाथों के बीच में रहे ।
  • शरीर को ऊपर की ओर अधिक – से – अधिक खिंचाव दें जिससे कि चक्राकार बन जाए ।
  • यह आसन 30 सेकेण्ड से 2 मिनट तक करें ।

लाभ –

  • यह आसन विद्यार्थियों के लिए बहुत उपयोगी है क्योंकि पूरे शरीर पर इसका प्रभाव पड़ता है , जिससे रक्त संचार , माँसपेशियों व हड्डियों में लचीलापन आता है ।
  • शरीर सुन्दर व सुडौल बनता है।
  • शरीर की लम्बाई बढ़ती है ।
  • कमर दर्द को दूर करता है । इसलिए पढ़ने वाले विद्यार्थियों व कम्प्यूटर पर काम करने वालों के लिए विशेष रूप से लाभदायक है ।

सावधानियां/विपरीत संकेत –

  • पूर्णता प्राप्त करने के पूर्व बार-बार अभ्यास करें।

2) गोमुखासन :-

विधि –

  • सुखासन की स्थिति में बैठ जाएँ ।
  • अब बाए पैर की एड़ी को दाहिने नितम्ब के पास रखें ।
  • दायें पैर को मोड़कर बायें पैर के ऊपर इस प्रकार रखे कि दायें पैर का घुटना बायें पैर के ऊपर रहे तथा एड़ी और पंजे का भाग नितंब को स्पर्श करें ।
  • अब बाएँ हाथ को पीठ के पीछे मोड़कर हथेलियों को ऊपर की ओर ले जाएँ ।
  • दाहिने हाथ को दाहिनें कंधे पर सीधा उठा लें और पीछे की ओर घुमाते हुए कोहनी से मोड़कर हाथों को परस्पर बांध ले । अब दोनों हाथों को धीरे से अपनी दिशा में खींचें ।
  • अपने मुड़े हुए दाहिने हाथ को ऊपर की और अपने क्षमतानुसार तानकर रखें ।
  • शरीर को सीधा रखें ।
  • श्वास नियंत्रित रखें और इस अवस्था में यशाशक्ति रुकने का प्रयास करें ।
  • इस आसन को हाथ और पैर को बदलकर पांच बार करें ।
  • अंत में धीरे – धीरे श्वास छोड़कर क्रमशः फिर से सुखासन की स्थिति में बैठ जाएँ ।

लाभ –

  • यह आसन करने से शरीर सुडौल , लचीला और आकर्षक बनता है ।
  • वजन कम करने के लिए यह आसन उपयोगी है ।
  • गोमुखासन मधुमेह रोग में अत्यंत लाभकारी है ।
  • निम्न रोगों में भी यह आसन लाभकारी हैं- गठिया , साइटिका , अपचन , कब्ज , धातु रोग , मन्दाग्नि , पीठदर्द , लैंगिक विकार , प्रदर रोग तथा बवासीर ।

सावधानियां/विपरीत संकेत

  • कंधे , पीठ , गर्दन , नितंब व घुटनों में दर्द होने पर यह आसन न करें ।
  • आसन करते समय तकलीफ होने पर तुरंत डॉक्टर से परामर्श लें।
  • शुरुआत में पीठ के पीछे दोनों हाथों को आपस में न पकड़ पाने पर जबरदस्ती न करें ।
  • गोमुखासन के समय को अभ्यास के साथ धीरे – धीरे बढ़ाना चाहिए ।

3) पर्वतासन :-

विधि –

  • फर्श पर आराम से बैठ जाएँ ।
  • श्वास को अंदर लेकर मूलबंध करके दोनों हाथों को ऊपर की तरफ सीधे खड़े कर लें ।
  • सांस को जितनी देर तक रोक सकते है रोके फिर सांस धीरे – धीरे छोड़ते हुए अपने हाथों को नीचे की ओर लाते हुए अपने घुटनों पर रख लें और अपने शरीर को वापिस पहले वाली अवस्था में ले आए ।

लाभ –

  • दमें के रोगियों के लिए पर्वतासन बहुत ही लाभदायक है ।
  • टांग व घुटने मजबूत होते हैं ।
  • कंधों में दर्द अथवा अकड़न की परेशानी दूर होती है ।
  • जिनका शरीर टेढ़ा हो या जो झुककर चलते है , उनके लिए यह आसन विशेष रूप से लाभदायक है।

सावधानियां/विपरीत संकेत –

  • हिप व पीठ की चोट होने पर इस आसन को न करें ।
  • कंधे की चोट होने पर इस आसन का अभ्यास न करें ।

उच्च रक्तचाप के बचाव तथा नियंत्रण में लाभकारी योगासन

1) वज्रासन :-

विधि –

  • पूर्व स्थिति : दोनों पैरो को सामने की ओर सीधे रखकर बैठे जाएँ।
  • दायें पैर को घुटने से मोड़कर दायें नितम्ब के नीचे रखें।
  • बायें पैर को घुटने से मोड़कर बायें नितम्ब के नीचे रखें।
  • कमर , गर्दन एवं सिर को सीधा रखते हुए दोनों पैरों पर इस प्रकार बैठे कि एड़ी खुली हुई तथा दोनों पैर के अंगूठे आपस में मिल जाए।
  • इस दौरान घुटने तथा पैर का निचला भाग जमीन से लगा रहे।
  • दोनों हाथों को जंघाओं पर रखे तथा दृष्टि सामने की ओर भूमध्य में अथवा आँखों को कोमलता से बंद रखे।

लाभ –

  • पिंडली और जंघाओं के लिए उत्तम है ।
  • उपापचय की प्रक्रिया को ठीक करता है ।
  • शरीर को सुडौल बनाता है ।
  • वजन कम करने में मददगार है ।

विपरीत संकेत/सावधानियां –

  • जोड़ों के दर्द से पीड़ित व्यक्ति इसे न करें ।
  • एड़ी के दर्द से पीड़ित व्यक्ति इसे न करें ।
  • इस आसन को करने से यदि कमर दर्द , कमजोरी या चक्कर आने जैसी समस्या हो तो कुछ के लिए इस आसन को बंद कर अपने डॉक्टर से परामर्श लें ।

2) ताड़ासन :-

विधि –

  • एक समतल जगह पर अपने दोनों पैरों को आपस में मिलाकर और दोनों हथेलियों को बगल में रखकर सीधे खड़े हो जाएँ ।
  • दोनों हाथों को पार्श्वभाग से दीर्घ श्वास भरते हुए ऊपर उठाएँ ।
  • हाथों को ऊपर ले जाकर हथेलियाँ को मिलाये और हथेलियाँ आसमान की तरफ ऊपर की ओर होनी चाहिए । हाथों की उंगलियाँ आपस में मिली होनी चाहिए ।
  • जैसे – जैसे हाथ ऊपर उठे वैसे – वैसे पैर की एड़िया भी ऊपर उठी रहनी चाहिए ।
  • हाथ ऊपर उठाते समय पेट अंदर लेना चाहिए ।
  • शरीर का भाग पंजों पर होना चाहिए ।
  • शरीर ऊपर की ओर पूरी तरह से तना रहना चाहिए ।
  • कमर सीधी नजर सामने की ओर गर्दन सीधी रखनी चाहिए ।
  • ताड़ासन की इस स्थिति में लम्बी सांस भरकर 1 से 2 मिनिट तक रुकना चाहिए ।
  • अब धीरे – धीरे सांस छोड़कर नीचे आकर पूर्व स्थिति में आना चाहिए ।
  • 1 से 2 मिनिट रुककर दोबारा इसी क्रिया को दोहराएँ ।
  • इस आसन को प्रतिदिन क्षमता और अभ्यास अनुसार 10 से 15 बार करें ।

लाभ –

  • दीर्घ श्वसन से फेफड़े सुदृढ़ एवं विस्तृत होते है ।
  • पैर और हाथ के स्नायु मजबूत बनते है ।
  • शारीरिक और मानसिक संतुलन बढ़ता है ।
  • आत्मविश्वास बढ़ता है ।
  • पाचन तंत्र मजबूत बनता है ।

सावधानियां/विपरीत संकेत –

  • अगर आप सिरदर्द या निम्न रक्तचाप के रोगी है तो यह आसन न करें ।
  • आसन करते समय आसन की अवधि अभ्यास के साथ धीरे – धीरे बढ़ाना चाहिए ।
  • आसन करते समय कोई परेशानी होने पर डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए ।

3) पवनमुक्तासन :-

विधि –

  • शरीर के नितम्ब भाग के सहारे जमीन पर लेट जाएँ ।
  • दोनों हाथों से दोनों घुटनों को मोड़कर छाती पर रखें ।
  • सांस छोड़ते समय दोनों घुटनों को हाथों से दबाकर छाती से लगाएँ तथा सिर को उठाते हुए घुटनों से नासिका ( Nose ) से छुएँ ।
  • 10 से 30 सेकेण्ड सांस को बाहर रोकते हुए इसी स्थिति में रहकर फिर पैरों को सीधा कर यह आसान 2 से 5 बार तक करें ।
  • 30 सेकेण्ड से 2 मिनट ।

लाभ –

  • इस आसन का पूरा प्रभाव पेट पर पड़ता है अतः पेट की पाचन , अवशोषण व निष्कासन की क्रियाओं को ठीक करता है ।
  • शरीर में उत्पन्न वायु पर नियन्त्रण करता है तथा अपान वायु का निष्कासन आसानी से होता है ।
  • घुटनों के जोड़ों में लचीलापन उत्पन्न करता है ।

सावधानियां/विपरीत संकेत

  • कमर दर्द की स्थिति में इस आसन का अभ्यास न करें ।
  • घुटने में दर्द होने पर इस आसन को न करें ।
  • भोजन के तुरंत बाद यह आसन कदापि न करें ।
  • इस आसन को उन्हें भी नहीं करनी चाहिए जिनके गर्दन में दर्द हो ।

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